Child Mortality : संयुक्त राष्ट्र की ‘लेवल एंड ट्रेंड्स इन चाइल्ड मोर्टलिटी’ 2025 की ताजा रिपोर्ट वैश्विक स्वास्थ्य के परिदृश्य में भारत के लिए गर्व और आत्मचिंतन दोनों का अवसर लेकर आयी है. रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में दुनियाभर में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु का आंकड़ा घटकर 49 लाख रह गया है, जिसमें भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और सराहनीय रही है. पिछले तीन दशकों में भारत ने बाल मृत्यु दर में जो गिरावट दर्ज की है, वह न केवल दक्षिण एशिया, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है.
रिपोर्ट के आंकड़े भारत की निरंतर प्रगति की पुष्टि करते हैं. वर्ष 1990 में भारत में ‘अंडर फाइव मोर्टलिटी रेट’ प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 127 थी, जो 2024 में घटकर मात्र 27 रह गयी है. इसी तरह, नवजात मृत्यु दर भी 1990 के 57 से घटकर 17 पर आ गयी है. भारत की इस सफलता के पीछे ‘यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम’, संस्थागत प्रसव में सुधार, और ‘स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट्स’ का विस्तार जैसे लक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप रहे हैं.
भारत ने निमोनिया, डायरिया और मलेरिया जैसी रोकथाम योग्य बीमारियों से होने वाली मौतों को कम करने में उत्कृष्ट कार्य किया है. इन प्रभावशाली आंकड़ों के बीच एक चिंताजनक पक्ष भी सामने आया है. रिपोर्ट बताती है कि भारत में सालाना लगभग 5.4 लाख बच्चों की मौत पांच वर्ष की उम्र से पहले होती है, जिनमें से करीब 3.9 लाख मौतें केवल नवजात शिशुओं की होती हैं. समय से पहले जन्म, जन्म के समय दम घुटना और संक्रमण जैसे कारण आज भी नवजात शिशुओं के लिए घातक बने हुए हैं.
भारत का लक्ष्य अब सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करना है, जिसके तहत ‘अंडर फाइव मोर्टलिटी’ को 25 से नीचे और ‘नवजात मृत्यु दर’ को 12 से नीचे लाने का संकल्प लिया गया है. रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि बाल स्वास्थ्य में निवेश केवल मानवीय कार्य नहीं, बल्कि एक ठोस आर्थिक निवेश है. आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और नीति निर्माता अपना ध्यान नवजात शिशुओं की विशिष्ट देखभाल और प्रसव पूर्व व प्रसव पश्चात सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाने पर केंद्रित करें. यदि भारत अपनी वर्तमान गति को बनाये रखता है और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच अंतिम छोर तक सुनिश्चित करता है, तो वह न केवल अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करेगा, बल्कि विश्व के लिए एक स्थायी मॉडल पेश करेगा.
