मर्यादा लांघते चैनल

टीआरपी की भूख ने टेलीविजन पत्रकारिता को गर्त में धकेल दिया है. इससे समूची पत्रकारिता की साख पर बट्टा लगा है.

खबरों को सनसनीखेज ढंग से परोसकर आगे रहने की होड़ में अधिकतर खबरिया चैनलों ने पत्रकारिता की हर मर्यादा को तोड़ दिया है. ऐसा करते हुए बड़े-बड़े एंकर व संपादक झूठी और गलत खबरें देने से भी बाज नहीं आते. रूस और यूक्रेन के युद्ध और हाल में दिल्ली के एक इलाके में पैदा हुए सांप्रदायिक तनाव की खबरें देते हुए तो टीवी चैनलों ने ऐसी हद ही कर दी कि केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को उन्हें कड़ी चेतावनी देनी पड़ी है.

सरकार की ओर से चैनलों को विभिन्न कानूनी प्रावधानों में उल्लिखित कार्यक्रम संहिता का पालन करने को कहा गया है. पिछले कुछ वर्षों से टेलीविजन एंकरों की भाषा और प्रस्तुति चीखने-चिल्लाने में बदल गयी है. बहस शोर-शराबे में तब्दील हो चुकी है. सरकार की इस चेतावनी में ऐसे कई उदाहरण दिये गये हैं, जिनमें एंकरों के स्वर उन्माद और उत्तेजना से सने हैं तथा शीर्षक सनसनी से लबरेज हैं.

संबंधित कानूनों में स्पष्ट कहा गया है कि ऐसे कार्यक्रम नहीं बनाये जाने चाहिए, जो अच्छी अभिरूचि और भद्रता के विरुद्ध हों. इनमें भड़काऊ, अश्लील, अपमानजनक, गलत और झूठी बातों से परहेज करने के निर्देश हैं. सवाल केवल कानून या नियमों के पालन का नहीं है. पत्रकारिता लोकतंत्र के आधारभूत स्तंभों में है. यह पेशे से कहीं अधिक कर्तव्य से जुड़ा हुआ व्यवहार है, जिसका उद्देश्य नागरिकों, समुदायों और देश-दुनिया का कल्याण है.

यह पत्रकारों को स्वयं समझना चाहिए कि उन्हें कोई खबर इस तरह नहीं देनी चाहिए, जिससे सामाजिक सद्भाव बिगड़े, अन्य देशों के साथ संबंध खराब हों तथा राष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचे. पत्रकारिता में झूठ की तो कोई जगह ही नहीं हो सकती है. पर ऐसा लगता है कि टीवी पत्रकारिता को इन मूल्यों से कोई सरोकार नहीं बचा है. केंद्र सरकार ने अपनी चेतावनी में स्पष्ट रेखांकित किया है कि चाहे युद्ध हो या तनाव, चैनलों ने अपुष्ट खबरें तो चलायी ही, उन्होंने दर्शकों को उकसाने या उन्माद फैलाने के लिए जान-बूझ कर झूठी बातें कहीं.

उल्लेखनीय है कि पिछले साल अफगानिस्तान की खबरें दिखाने के क्रम में अनेक चैनलों ने किसी अन्य युद्ध के वीडियो चलाये थे. इतना ही नहीं, कुछ ने तो वीडियो गेम के हिस्सों को भी प्रसारित कर दिया था. इससे दुनियाभर में भारतीय चैनल हंसी के पात्र बने थे. नामचीन एंकरों और रिपोर्टरों की हरकतें अक्सर चर्चा में रहती हैं. टीआरपी की भूख ने टेलीविजन पत्रकारिता को गर्त में धकेल दिया है. इससे समूची पत्रकारिता की साख पर बट्टा लगा है.

इस गिरावट को केवल आलोचना, भर्त्सना और सरकारी नोटिस से नहीं रोका जा सकता है. इसमें दर्शकों और नागरिक समाज के साथ मीडिया को भी सक्रिय व सकारात्मक भूमिका निभानी होगी. दर्शकों को गैरजिम्मेदार चैनलों से सवाल करना चाहिए. आपत्तिजनक आचरण और प्रसारण पर सोशल मीडिया एवं परंपरागत मीडिया में चर्चाएं होनी चाहिए. सबसे जरूरी तो यह है कि टीवी के बड़े चेहरों को अपनी अंतरात्मा में झांकना होगा.

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