केंद्रीकृत दवा खरीद

विविधतापूर्ण और विस्तृत तंत्र की मांग को पूरा करने के लिए सरकार को मजबूत योजना और पूर्वानुमान पर काम करना होगा, जिसके लिए बड़े स्तर पर प्रभावी डेटा अवसंचरना तैयार करना आवश्यक है.

विभिन्न प्रकार की जीवनरक्षक दवाओं की गुणवत्ता और कीमतों को लेकर अक्सर चिंता जाहिर की जाती है. हालांकि, आमजन हेतु स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ हों, इसके लिए वर्षों से कोशिशें भी हो रही हैं. इस दिशा में मोदी सरकार एक बड़ी पहल कर रही है. सरकार अब सभी सरकारी एजेंसियों के लिए दवा खरीद हेतु एक साझा प्लेटफार्म तैयार करेगी. इसके माध्यम से केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) के साथ अन्य सार्वजनिक उपक्रमों- कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) के अस्पतालों, जन औषधि योजना और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थानों (एम्स), के लिए दवाओं की खरीद की जायेगी. व्यापक स्तर पर दवा खरीद की साझा व्यवस्था होने से गुणवत्ता और कीमतों में एकरूपता आयेगी.

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सालाना लगभग 22000 करोड़ की दवा खरीद की जाती है, जोकि कुल फार्मा बाजार का लगभग 15 प्रतिशत है. वर्तमान में एक ही प्रकार की दवा की खरीद विभिन्न सरकारी विभागों और मंत्रालयों द्वारा अलग-अलग दामों पर की जाती है. नयी पहल से कुछ फार्मा कंपनियों की ओवर-बिलिंग को रोका जा सकेगा, इससे बचत भी होगी. हालांकि, फायदों के साथ-साथ इस कार्यक्रम की व्यापकता और जटिलता पर भी विचार करना होगा. पायलट प्रोजेक्ट से इसकी क्रमिक शुरुआत हो सकती है. दवाओं की संगठित खरीद की व्यवस्था बनने से अगर 10 प्रतिशत की बचत होती है, तो उसका फायदा मरीजों को हस्तांतरित किया जा सकता है. देशभर में सीजीएचएस के 1200 अस्पताल, 200 डायग्नोस्टिक सेंटर, 500 वेलनेस सेंटर और 8000 से अधिक जन औषधि स्टोर हैं.

इस तरह के विविधतापूर्ण और विस्तृत तंत्र की मांग को पूरा करने के लिए सरकार को मजबूत योजना और पूर्वानुमान पर काम करना होगा, जिसके लिए बड़े स्तर पर प्रभावी डेटा अवसंचरना तैयार करना आवश्यक है. साथ ही, बोलीदाताओं के लिए मजबूत तकनीकी योग्यता मानदंडों और व्यवस्थित परीक्षण प्रोटोकॉल सुनिश्चित करना होगा. जन औषधि स्टोर अभियान में मिली सीख उल्लेखनीय है. सरकार का लक्ष्य आमजन को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने का था, लेकिन गुणवत्ता बरकरार नहीं रखी जा सकी.

जब सख्ती हुई, तो योजना का राजस्व पांच वर्षों में 55 गुना बढ़ गया, यानी 2016-17 में 12 करोड़ से बढ़कर 2020-21 में 665 करोड़ रुपये हो गया. दवाओं की गुणवत्ता आगामी योजना के भी केंद्र में होना चाहिए, साथ ही हिताधारकों का विश्वास अर्जित करना भी जरूरी है. चूंकि, सार्वजनिक स्वास्थ्य राज्यों के अधिकारक्षेत्र में है, लिहाजा, इसमें राज्यों की भागीदारी से लाभ का दायरा बड़ा हो सकता है. इस प्रकार के प्रगतिशील कदम निश्चित ही भविष्य में प्रभावी स्वास्थ्य तंत्र की बुनियाद साबित होंगे.

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