Rajya Sabha elections : देश के 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों पर 16 मार्च को हुए चुनाव के अंतिम नतीजे एनडीए के पक्ष में रहे. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुवाई वाले एनडीए को जहां 22 सीटों पर जीत मिली वहीं, विपक्ष को 15 सीटों से संतोष करना पड़ा. इस चुनाव के बाद राज्यसभा में जहां एनडीए को और मजबूती मिली है, वहीं भाजपा की शक्ति भी काफी बढ़ गयी है.
यदि हम राज्यसभा चुनाव के नतीजों पर गौर करें, तो पायेंगे कि बिहार, ओडिशा और हरियाणा में भाजपा ने उन सीटों पर तो जीत दर्ज की ही, जिन पर उसकी जीत तय मानी जा रही थी, उसने तीन ऐसी सीटें भी जीत लीं, जिनमें क्रॉस वोटिंग हुई. इस कारण बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा. हालांकि, राजद के उम्मीदवार के पास जीत के लिए पर्याप्त 41 वोट की बजाय 35 वोट ही थे, पर बीएसपी और औवैसी की पार्टी एआइएमआइएम के मतों को मिलाकर वोट पर्याप्त हो जा रहे थे. परंतु राजद के एक और कांग्रेस के तीन विधायक दूसरी तरफ चले गये और राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार की हार हो गयी. इस तरह भाजपा ने विपक्ष के खेमे में सेंध लगायी और उसके उम्मीदवार को हराने में सफल हो गयी.
इस चुनाव को भाजपा का शो माना जा रहा है, पर ऐसा चुनाव में होता रहता है कि एक-दो लोग इधर-उधर चले जाते हैं. इस चुनाव का असली महत्व यह है कि नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री पद को छोड़कर राज्यसभा के सदस्य बने हैं. और ऐसा लगता है कि यह उनकी मर्जी से हुआ है. सच मानिए, तो यह भाजपा की एक सोची-समझी रणनीति है. क्योंकि यह सभी जानते हैं कि वह बिहार में सरकार का नेतृत्व करना चाह रही थी, परंतु ऐसा माना जा रहा था कि इसमें अभी छह-आठ महीने की देरी है. यहां दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए मनाना इतना आसान नहीं लग रहा था.
लेकिन यह सब कुछ तीन महीने के अंदर ही हो गया. दरअसल, ऐसा करने की वजह भाजपा द्वारा एक प्रस्ताव को अमलीजामा पहनाने की हामी है. दिल्ली में नीतीश कुमार को क्या भूमिका दी जायेगी- उन्हें कोई मंत्रालय दिया जाता है या कुछ और भूमिका दी जाती है- यह देखने वाली बात होगी. यहां जो बात महत्वपूर्ण है, वह यह कि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद चूंकि भाजपा बिहार में नेतृत्व की भूमिका में रहेगी, ऐसे में जनता दल (यू ) के जो 12 लोकसभा सांसद हैं, उन पर उसका नियंत्रण बढ़ेगा. इसके साथ-साथ, भाजपा का यह प्रयास भी रहेगा कि लोकसभा में उसके सहयोगी दलों के जितने भी सांसद हैं, वे टस से मस न हों, इधर से उधर न जाने पायें और उसके पास लोकसभा में संख्या बल पर्याप्त बना रहे.
यह बात भी उल्लेखनीय है कि भाजपा ने महाराष्ट्र से शरद पवार को निर्विरोध राज्यसभा में आने दिया है. यदि शरद पवार की जगह कोई दूसरा व्यक्ति होता, तो बहुत संभव है कि भाजपा उसे निर्विरोध चुनकर राज्यसभा नहीं आने देती. यहां मेरा अनुमान कहता है कि भाजपा ने ऐसा इसलिए किया है, क्योंकि लोकसभा में शरद पवार की पार्टी के आठ सांसद हैं, जो जरूरत पड़ने पर भविष्य में भाजपा का साथ दे सकते हैं. तो शरद पवार की खिलाफत न करने की भाजपा की नीति का अर्थ यही है कि वह उनकी नजरों में अच्छी बनी रहे, ताकि समय आने पर वह उनका समर्थन ले सके.
जहां तक नीतीश कुमार की बात है, तो उनके लिए राज्यसभा में आना भी भाजपा के लिए लाभ की बात है. एक बात तो साफ है कि बिहार में भाजपा की पकड़ मजबूत हो जायेगी, क्योंकि वह दोनों जगह सत्ता में है. एक बात और, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस समय जिस तरह की मुश्किलें हैं, उसका असर घरेलू राजनीति पर भी पड़ सकता है. चूंकि इस समय एक अनिश्चितता का माहौल है, ऐसे में भाजपा यह सुनिश्चित करना चाह रही थी कि लोकसभा में उसके सांसदों और लोकसभा में उसके समर्थन पर कोई आंच न आये. तो भाजपा के लिए नीतीश कुमार और शरद पवार का राज्यसभा में आना इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण है.
अब बात गैर एनडीए दलों की, तो वे राज्यसभा चुनाव को लेकर बहुत गंभीर, बहुत आक्रामक नहीं दिखे. यह पता होते हुए भी कि भाजपा के पास कितनी बड़ी मशीनरी है और वह अपनी एक-एक सीट के लिए किस तरह विस्तार से रणनीति बनाती है, किस तरह से तैयारी करती है, विपक्ष हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा और उसके लोग खिसक गये. जबकि भाजपा की रणनीति को देखते हुए उनकी तैयारी दोगुनी-तिगुनी होनी चाहिए थी, पर सच कहूं, तो उनकी तैयारी कहीं नहीं दिखी. इससे पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है और इस बार भी ऐसा ही हुआ. चुनाव में साफ दिखा कि गैर एनडीए दलों में एकता नहीं बन पायी थी. इनके बीच का असंतोष सामने आ गया.
इस बात का जिक्र भी जरूरी है कि टैरिफ को लेकर, ईरान युद्ध को लेकर, गैस सिलेंडर को लेकर इन दिनों विपक्ष जितना आक्रामक रहा है, उतनी आक्रामकता चुनाव जीतने के मामले में वह नहीं दिखा पाया. यह तो वही बात हो गयी कि आप भले ही संसद में, देशभर में मुद्दों को उठाते रहिए, उन पर बातें करते रहिए, पर यदि चुनाव ही नहीं जीत पा रहे हैं, तो इसका क्या लाभ. इस तरह की चीजें आगे न हों, इसके लिए विपक्ष को इकट्ठे मिलकर चलना होगा और विस्तार से चुनाव जीतने की योजना बनानी होगी. भाजपा की रणनीति को देखते हुए अपनी रणनीति बनानी होगी और हर चुनाव को गंभीरता से लेना होगा.
दरअसल, विपक्ष के खराब प्रदर्शन की वजह यह भी है कि वह अपनी योजनाओं को विस्तारित करने में चूक जाता है, क्योंकि उसका संगठन जमीनी स्तर पर मजबूत नहीं है, कांग्रेस का तो बिल्कुल भी नहीं है. यदि बूथ लेवल पर आपके कार्यकर्ता नहीं हैं, जो आपकी बात लोगों तक पहुंचा सकें, लोगों को पार्टी के पक्ष में कर सकें, तो आप मात खायेंगे ही. जब आपके पास वैसी सांगठनिक शक्ति ही नहीं है, जो आपके लोगों को एकजुट रख सके, तो वही होगा, जो राज्यसभा चुनाव के दौरान हुआ. विपक्ष यदि अपने लोगों को समेट कर नहीं रख पाया, तो उसे इस बारे में सोचना होगा और अपने भीतर की खामियों को दुरुस्त करना होगा. अंत में, बस इतना ही कि यह एक महत्वपूर्ण चुनाव रहा, जिसे लंबे समय तक याद रखा जायेगा.
(बातचीत पर आधारित)
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)
