जयंती विशेष: शास्त्रीय संगीत के अप्रतिम नक्षत्र थे पं ओंकारनाथ ठाकुर

Pandit Omkarnath Thakur : तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की ओर से जब उन्हें इसका निमंत्रण मिला, तो उन्होंने उसे स्वीकारने के लिए एक शर्त रख दी थी. कह दिया था कि वे गायेंगे तो पूरा वंदेमातरम, उसका कोई आधा-अधूरा हिस्सा नहीं. पटेल ने बेहिचक उनकी शर्त स्वीकार कर ली थी, तो उन्होंने उसे अपनी जीत के रूप में देखा था.

Pandit Omkarnath Thakur : हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अप्रतिम नक्षत्र पं ओंकारनाथ ठाकुर अपने संघर्षमय जीवन में जो कीर्तिमान और उपलब्धियां अपने नाम कर गये हैं, उनमें एक यह भी है कि 1955 में उन्हें पद्मश्री प्रदान किया गया, तो वे उसे पाने वाले संगीत क्षेत्र की पहली विभूति थे. परंतु 15 अगस्त, 1947 को आजादी की पहली सुबह स्वयं को मिले उस अवसर को वे अपने सारे कीर्तिमानों व उपलब्धियों से ऊपर मानते थे, जिसके तहत उन्होंने आकाशवाणी (जिसे तब ऑल इंडिया रेडियो कहा जाता था) से देशवासियों के समक्ष पूरा ‘वंदेमातरम’ गाया था. उन्हें यह अवसर मिलने के पीछे एक दिलचस्प वाकया है.

तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की ओर से जब उन्हें इसका निमंत्रण मिला, तो उन्होंने उसे स्वीकारने के लिए एक शर्त रख दी थी. कह दिया था कि वे गायेंगे तो पूरा वंदेमातरम, उसका कोई आधा-अधूरा हिस्सा नहीं. पटेल ने बेहिचक उनकी शर्त स्वीकार कर ली थी, तो उन्होंने उसे अपनी जीत के रूप में देखा था. दरअसल, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक समय ऐसा भी था जब वे कांग्रेस के अधिवेशनों में पूरा वंदेमातरम गाया करते थे. पर बाद में कुछ आपत्तियों के मद्देनजर कांग्रेस ने जब उस गायन को गीत के एक हिस्से तक सीमित कर दिया, तब उन्होंने उसे गाना छोड़ दिया.

स्वाभाविक ही, आजादी की पहली सुबह जब उन्हें देश के समक्ष उसे पूरा गाने का मौका मिला, तो वे आह्लादित हो उठे और आकाशवाणी के बॉम्बे स्टूडियो में माइक्रोफोन के सामने खड़े होकर उसे ससम्मान गाया. उनकी प्रस्तुतियां श्रोताओं को इस तरह तन्मय और विमुग्ध कर देती थीं, कि उनकी तान रुकती तो श्रोताओं की सिसकियां सुनाई देने लग जाती थीं. कहते हैं कि उनको सुनने का आनंद ‘गूंगे के गुड़’ जैसा था, जिसे महसूस ही किया जा सकता था, बताया नहीं. एक बार महात्मा गांधी ने उनका गायन सुना तो कहा था कि ‘वे अपनी मात्र एक रचना से जनसमूह को उतना प्रभावित कर सकते हैं, जितना मैं अपने अनेक भाषणों से भी नहीं कर सकता.’

वर्ष 1933 में तो एक दिन ऐसा भी हुआ कि महीनों से अनिद्रा से पीड़ित इटली के तानाशाह मुसोलिनी को उनका गायन सुनने के बाद चैन की नींद आयी. जानकारों के अनुसार, वे इटली गये हुए थे, तो अनिद्रा पीड़ित मुसोलिनी ने एक प्रस्तुति के लिए उनको अपने महल में आमंत्रित किया. वहां उनके गायन का जादू उसके सिर ऐसा चढ़ा कि वह गहरी नींद में सो गया और उठा तो केवल उनका ही नहीं, हिंदुस्तानी संगीत का भी मुरीद हो गया. अगले दिन उसने उनको धन्यवाद के साथ मानव मस्तिष्क पर संगीत के प्रभावों के अध्ययन करने के लिए नवगठित विश्वविद्यालय का निदेशक बनाने की इच्छा जतायी. पर ओंकारनाथ ने उसका दिया नियुक्ति पत्र स्वीकार नहीं किया.


वे हिंदुस्तानी संगीत के सबसे प्राचीन ग्वालियर घराने के शीर्षस्थ गायक थे. वे जितने अच्छे संगीतज्ञ थे, उतने ही आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी भी. उनका संगीत तो अपने आप में मंत्रमुग्ध करने वाला था ही, प्रभावशाली और भावपूर्ण गायन सोने पर सुहागा जैसा था. उनकी गायकी में रंजकता तो होती ही थी, वे उसमें ऐसे रंग उड़ेलते थे कि सामान्य श्रोता भी उनकी कला के मुरीद हो जाते थे. वर्ष 1897 में 24 जून को वे गौरीशंकर की चौथी और सबसे छोटी संतान के रूप में जन्मे थे. ओंकार की भक्ति में डूबे रहने वाले पिता ने उन्हीं के नाम पर अपनी इस संतान का नाम ओंकारनाथ रख दिया. उन्हें छुटपन में ही पिता को खो देना और उसके बाद बड़े दुर्दिनों का सामना करना पड़ा. फिर भी उन्होंने संगीत साधना के प्रति अपनी लगन को कम नहीं होने दिया. भरूच के सेठ शापुरजी मंचेरजी ने उनकी लगन देख उन्हें पं विष्णु दिगंबर पलुस्कर के मुंबई स्थित संगीत विद्यालय में प्रवेश दिलवा दिया, फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. पलुस्कर ने उनका समर्पण देख महज 20 वर्ष की आयु में उन्हें लाहौर स्थित गंधर्व महाविद्यालय में प्रधानाचार्य नियुक्त कर दिया.


प्रसंगवश, उन्होंने मुंबई में अपने संगीत निकेतन की स्थापना कर रखी थी, पर 1950 में पं गोविंद मालवीय ने अपने पिता महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की इच्छानुसार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में संगीत विभाग की स्थापना की, तो उन्हें विभाग का प्रथम डीन नियुक्त किया. डीन के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने दो प्रमुख संगीत शास्त्रीय ग्रंथों पर काम किया. इनमें 1956 में प्रकाशित ‘प्रणव भारती’ संगीत के सैद्धांतिक पहलुओं पर ऐतिहासिक ग्रंथ है और 1938 व 1962 के बीच छह खंडों में प्रकाशित ‘संगीतांजलि’ को संगीत का मैनुअल माना जाता है, जिसमें राग व्याकरण और संगीत प्रदर्शन के व्यावहारिक पहलुओं की जानकारी समाहित है. पद्मश्री के अतिरिक्त उन्हें प्राप्त अन्य सम्मानों में ‘संगीत नाटक अकादमी ‘पुरस्कार, बीएचयू से ‘डॉक्टरेट’ की उपाधि, 1940 में कलकत्ता संस्कृत महाविद्यालय से ‘संगीत मार्तंड’ और 1930 में नेपाल सरकार से प्राप्त ‘संगीत महामहोदय’ की उपाधि प्रमुख हैं. संगीत के इस अप्रतिम नक्षत्र ने 29 दिसंबर, 1967 को इस संसार को अलविदा कह दिया.

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