बिहार को आर्थिक मदद की जरूरत

बिहार को उबारने के लिए अभी केंद्र द्वारा जो मदद मिली है, उसे दोगुना करने की आवश्यकता है ताकि यह राज्य राष्ट्रीय विकास में अपना समुचित योगदान दे सके.

मोहन गुरुस्वामी, अर्थशास्त्री

Mohanguru@gmail.com

पिछले विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के लिए 50 हजार करोड़ रुपये के पैकेज का एलान किया था. उसी जुलाई में जम्मू-कश्मीर के लिए एक लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की गयी थी. स्वाभाविक रूप से यहां यह प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों देश के सबसे गरीब व पिछड़े राज्य की तुलना में जम्मू-कश्मीर के लिए दोगुना पैकेज जारी किया गया. बिहार की आबादी जम्मू-कश्मीर की तुलना में कमोबेश दस गुनी है. दरअसल, हमें इस सच्चाई को समझना होगा कि पचास के दशक में घोषित पहली योजना से लेकर आज तक केंद्रीय निधि में वाजिब हिस्सेदारी और अधिकार से बिहार को वंचित रखा गया है.

बिहार भारत का सबसे गरीब और पिछड़ा राज्य है. यह देश का एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां सार्वभौम गरीबी का स्तर (46-70 प्रतिशत) उच्चतम है. बिहार की वार्षिक प्रति व्यक्ति आय 3,650 रुपये है, जो राष्ट्रीय औसत 11,625 रुपये का एक तिहाई है. बिहार की बहुसंख्य आबादी (52.47 प्रतिशत) अशिक्षित है. इसके अलावा अन्य समस्याएं भी गंभीर हैं. लेकिन इस राज्य का दूसरा पहलू भी है. यहां शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 पर 62 है, जो राष्ट्रीय औसत 66 से कम है. यह भी दिलचस्प है कि इस राज्य का शिशु मृत्यु दर उत्तर प्रदेश (83) और ओडिशा (91) से केवल बेहतर ही नहीं है, बल्कि आंध्र प्रदेश और हरियाणा (66-66 प्रतिशत) से भी बेहतर है.

इतना ही नहीं, बिहारी पुरुष की जीवन प्रत्याशा 63.6 वर्ष है, जो भारतीय पुरुष की औसत जीवन प्रत्याशा (62.4 वर्ष) से बेहतर है. बिहार में 70.4 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि है और इसकी उपज प्रति हेक्टेयर 1,679 किलोग्राम है, जो राष्ट्रीय औसत 1,739 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से कम है. हालांकि, यह आंकड़ा छह अन्य राज्यों, जिसमें बड़े खेतिहर राज्य कर्नाटक और महाराष्ट्र भी शामिल हैं, उनसे बेहतर है. ये आंकड़े राज्य की सकारात्मक उपलब्धि और संभावना की ओर इंगित करते हैं. इन सबके बावजूद सामाजिक-आर्थिक मामलों में बिहार की स्थिति दयनीय है.

फिर यहां यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ऐसा क्यों है? पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश का प्रति व्यक्ति विकास व्यय 7,935 रुपये की तुलना में, बिहार का प्रति व्यक्ति विकास व्यय 3,633 रुपये ही रहा है, जो राष्ट्रीय औसत के आधे से भी कम है. हालांकि यह कई कारकों पर निर्भर करता है, जिसमें राष्ट्रीय खजाने में राज्य का योगदान भी शामिल होता है. इस राज्य में 10वीं योजना का प्रति व्यक्ति व्यय 2,533 रुपये रहा, जो गुजरात (9,289.10 रुपये), कर्नाटक (8,260 रुपये) और पंजाब (7,681.20 रुपये) की तुलना में एक तिहाई से भी कम था. माना कि अब योजना आयोग नहीं है, लेकिन नीति आयोग तो है. लेकिन अब कौन सी नीति है इस संबंध में?

जब कोई क्षेत्र तेजी से पिछड़ रहा हो, तो विकास के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होती है. परिवार में कमजोर या बीमार बच्चे के लिए अधिक देखरेख की जरूरत होती है. केवल जंगल राज हम कमजोर और दुर्बल को नजरअंदाज कर योग्यतम की उत्तरजीविता देखते हैं. आर्थिक-सामाजिक दशा के आधार पर बिहार को अतिरिक्त मदद से ही नहीं, बल्कि उसके उचित अधिकार से भी वंचित रखा गया.

प्रति व्यक्ति निवेश की दयनीय स्थिति से यह स्पष्ट है कि केंद्र सरकार द्वारा ऐतिहासिक रूप से व्यवस्थागत ढंग से राज्य को वांछित निधि से वंचित रखा गया. लंबे अरसे तक केंद्र सरकार के साथ राजनीतिक तालमेल के अभाव की कीमत भी बिहार को चुकानी पड़ी. यह अवधि 1992 से 2004 तक रही. बीते कुछ वर्षों से केंद्र की सरकार में बिहार और सत्तारूढ़ गठबंधन शामिल है तथा इसके बारे में यह माना जाता है कि वह राज्य को लेकर सहयोग का रुख रखती है.

यह स्पष्ट है कि केंद्र के साथ राजनीतिक तालमेल वाले राज्य केंद्रीय मदद के मामले में बेहतर स्थिति में हैं. राजनीतिक तौर पर केंद्र के करीबी रहे आंध्र प्रदेश ने पिछले कुछ वर्षों में बेहतर विकास किया है. केंद्र से मिलनेवाले ऋण के मामले में भी बिहार को नजरअंदाज किया गया. बिहार में राज्य सरकार के चार प्रमुख विकास योजनाओं में निवेश तुलनात्मक तौर पर कम रहा.

बिहार में सड़क पर प्रति व्यक्ति व्यय मात्र 44.60 रुपये रहा, जो राष्ट्रीय औसत (117.80 रुपये) का मात्र 38 प्रतिशत है. इसी तरह बिहार का सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण पर प्रति व्यक्ति खर्च 104.40 रुपये रहा, जबकि राष्ट्रीय औसत 199.20 रुपये है. दसवीं पंचवर्षीय योजना में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय औसत के हिसाब से बिहार का हिस्सा 48,216.66 करोड़ होना चाहिए, जबकि उसे 21,000.00 करोड़ ही आवंटित किया गया. इस चलन की शुरुआत पहली पंचवर्षीय योजना में ही हो गयी थी. अभी संचयी कमी 80,000 करोड़ से अधिक की है यानी इतनी अतिरिक्त राशि पर उसका दावा बनता है.

यदि प्रचलित राष्ट्रीय ऋण जमा अनुपात लाभ को देखें, तो बिहार को बैंकों से क्रेडिट के तौर पर 44,830 करोड़ मिलना चाहिए था, जबकि वास्तव में इस राज्य को केवल 5,635.76 करोड़ ही मिला. इसी तरह वित्तीय संस्थाओं से बिहार को मात्र 551.60 रुपये प्रति व्यक्ति अनुदान मिला, जबकि राष्ट्रीय औसत 4,828.80 रुपये प्रति व्यक्ति है. इससे स्पष्ट है कि बिहार में शायद ही कोई औद्योगिक गतिविधि हो रही है. नाबार्ड द्वारा कम निवेश के लिए कोई बहाना नहीं है. यह कोई तर्क नहीं है कि बिहार में कोई कृषि कार्य नहीं हो रहा है. अगर वित्तीय संस्थान प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय औसत के हिसाब से निवेश करें, तो राज्य को 40,020.51 करोड़ रुपये प्राप्त होंगे. जबकि सच्चाई यही है कि राज्य को 4,571.59 करोड़ ही मिले.

इन बातों से पता चलता है कि बिहार का केवल हक ही नहीं छीना गया, बल्कि इस सबसे पिछड़े राज्य से पूंजी का निकास भी हुआ. यह एक क्रूर विरोधाभास है. इस पूंजी द्वारा अन्य क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों का वित्त पोषण किया गया और वहां उच्च कर व्यवस्था के साथ केंद्रीय मदद भी मुहैया करायी गयी. थोड़ी कड़ी भाषा में कहें, तो केंद्रीय निधि में वाजिब अधिकार से वंचित कर बिहार को व्यवस्थागत तरीके से विकसित नहीं होने दिया गया. अभी केंद्र द्वारा जो मदद मिली है, उसे दोगुना करने की आवश्यकता है, ताकि यह राज्य राष्ट्रीय विकास में अपना समुचित योगदान दे सके.

(ये लेखक के निजी िवचार हैं)

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