Politics 2026: तमाम राजनीतिक दलों की तरफ से चुनावी दांवपेच शुरू हो गये हैं, जिससे कि इस साल होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया जा सके. ये चुनाव अप्रैल और मई से पहले हो जायेंगे. इनमें से असम, पश्चिम बंगाल और पुददुचेरी के लिए चुनाव मार्च/अप्रैल में होंगे, तो तमिलनाडु और केरल विधानसभाओं के लिए अप्रैल/मई में. चुनाव का ज्यादा शोर मचाने की वजह निश्चित तौर पर भाजपा का मैदान में होना और प्रमुख खिलाड़ी बने रहना है. कायदे से वह एक राज्य में शासन में है और दूसरे में काफी पिछड़कर मुख्य विपक्ष है. हालांकि कांग्रेस भी संभावनाएं तलाशेंगी, पर पांच राज्यों में होने जा रहे चुनावों में भाजपा का जोर दूसरे दलों से ज्यादा रहेगा. अन्य दलों से भाजपा आगे निकली है, तो उसमें उसके चुनाव लड़ने के तरीके, साधनों की भरभार और साल के 365 दिन की तैयारी का बड़ा हाथ है. और अन्य राज्यों के मुकाबले पश्चिम बंगाल में भाजपा की तैयारी सबसे ज्यादा दिखायी दे रही है.
दरअसल दो लोकसभा और दो विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को मुख्य टक्कर देने के बाद उसे लग रहा है कि 15 साल के ममता राज से लोगों की जो नाराजगी बढ़ी है, उसका लाभ लेकर वह इस बार बंगाल का किला फतह कर सकती है. पर उसकी मुश्किल यह है कि उसके पक्ष में 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से जो माहौल बना था, वह उतार पर आता दिखने लगा है. उसका वोट प्रतिशत गिरा है और तृणमूल का बढ़ा है. साथ ही, उसके सांसद और विधायक भी कम चुने गये हैं. दलबदल में भी अब उसकी तरफ आने वालों की रफ्तार कम हुई है.
बंगाली समाज जहां भाजपा को वोट देने के मामले में बंटा हुआ है, वहीं लगभग एक चौथाई मुसलमान मतदाता भी अब पूरी तरह तृणमूल के साथ आ गये हैं. जबकि पहले कांग्रेस और वाम दलों को भी यह वोट मिलता था. भाजपा ने एक बार ध्रुवीकरण, तो दूसरी बार नमोशूद्रो की गोलबंदी कर सफलता पानी चाही, जो आंशिक रूप से ही सफल हुई. पश्चिम बंगाल में समाज सुधार आंदोलनों के चलते जाति और संप्रदाय की गोलबंदी कम है और समाज पर प्रभावी भद्रलोक में भाजपा की घुसपैठ नहीं है. इस बार भाजपा ने एक युवा कायस्थ नितिन नबीन को अपना अध्यक्ष चुनकर कुछ अलग संकेत देने की कोशिश की है, लेकिन इससे पहले पंचायत चुनाव में बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार उतारने का उसका दांव पिट गया है. भाजपा की मुश्किल कांग्रेस और वाम दलों के एकदम पस्त होने से भी बढ़ी है, जिनके वोट उसकी तरफ आने से ज्यादा तृणमूल की तरफ गये हैं. दो चुनावों में भाजपा का वोट प्रतिशत सिर्फ डेढ़ फीसदी बढ़ा, जबकि तृणमूल ने तीन फीसदी ज्यादा वोट पा लिये हैं.
असम में कांग्रेस ने जब से मौलाना बदरुद्दीन वाली मुसलमानों की पार्टी से रिश्ता तोड़ा है, उसे मुसलमानों का भरपूर वोट तो मिला ही है, भाजपा के लिए उस पर हमला करना और चुनाव को ध्रुवीकृत करना मुश्किल हुआ है. राज्य में सीटों का अंतर काफी है, लेकिन वोट प्रतिशत की लड़ाई बराबरी वाली हो गयी है. असम में बहुत किस्म की अस्मिताएं/पहचान काम करते हैं, लेकिन नागरिकता, सीएए, पॉपुलेशन रजिस्टर, जनगणना और गहन मतदाता सर्वेक्षण जैसे किसी भी सवाल पर स्पष्ट फैसला न लेना और कोई नतीजा न देना भाजपा को परेशान कर सकता है. लेकिन जिस तरह भाजपा चुनाव लड़ती है, वैसा और कोई नहीं लड़ता, यह सच्चाई भी याद रखनी होगी. भाजपा चुनौतियों को भी अपनी चुनावी सफलताओं में बदलने में कुशल है. दूसरी तरफ, कांग्रेस के लिए बेहतर संभावनाओं की बात करने वाले भूलते हैं कि विपक्ष वहां सीटों पर तालमेल बनाने के मुद्दे पर उलझा हुआ है.
तमिलनाडु के चुनाव में पूरा विपक्ष पहले से कमजोर लग रहा है. अन्नाद्रमुक में टूट और भाजपा का उससे छिटकना ही नहीं, वन्नीयारों वाली पार्टी पीएमके और अभिनेता विजयकांत की गवांडीयरों वाली पार्टी अभी हाथ-पांव ही मार रही है. अन्नाद्रमुक से निकले थेवर नेता पन्नीरसेलवम और दिनाकरण भी अभी ठिकाना नहीं पा सके हैं. उधर द्रमुक, कांग्रेस और वाम दलों का गठबंधन जमीन पर मजबूत दिख रहा है. लोकसभा चुनाव के नतीजे तो बताते हैं कि विपक्षी गठजोड़ बन भी जाये, तो भी स्टालिन को हराना कठिन है. केरल को लेकर भाजपा जरूर इस बार उत्साहित है, जो स्वाभाविक है.
हालांकि वहां भी लोकसभा चुनाव में वह शून्य पर ही आ गयी थी. लेकिन उसे ठीक-ठाक वोट मिले हैं और अभी तिरुवनंतपुरम की स्थानीय सरकार पर उसके कब्जे से उसका उत्साह बढ़ा है. पर बहुत साफ जातिगत और सांप्रदायिक गोलबंदी वाले केरल समाज में भाजपा कुल मिलाकर हिंदू नायरों और कुछ असंबद्ध युवकों को ही आकर्षित कर पायी है. और यह वोट जितना बढ़ेगा, दस साल से शासन कर रही वाम मोर्चा सरकार की परेशानियां बढ़ेंगी. यह स्थिति कांग्रेस के लिए अच्छी बन जाती है, जिसके पास ज्यादा कुछ नहीं, राहुल और प्रियंका गांधी के यहां से चुनाव लड़ने के चलते आया उत्साह भर है. बीस लाख से कम आबादी वाले पुददुचेरी की आबादी का संतुलन बहुत नाजुक है, इसलिए कुछ कहा नहीं जा सकता. कुल मिलाकर, इस साल होने जा रहे चुनावों में पश्चिम बंगाल में भाजपा को और असम तथा केरल में कांग्रेस को सब कुछ झोंक देते देखा जा सकता है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
