मणींद्र नाथ ठाकुर
एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू
आदमी हिंसक क्यों हो जाता है? क्या वह स्वाभाव से ही हिंसक है या फिर परिस्थितिवश उसके स्वाभाव में उग्रता बढ़ जाती है? यह सवाल आज के भारत को समझने के लिए बेहद जरूरी है, क्योंकि खबरें अच्छी नहीं हैं. कल तक जिस युवा जनसंख्या पर हम गर्व कर रहे थे, आज अचानक हमें कहा जा रहा है कि वे हिंसक और राष्ट्र विरोधी हो गये हैं.
पंजाब विश्वविद्यालय में कोई अनजान व्यक्ति भी चला जाये, तो उसकी स्वाभाविक प्रतिकिया यही होगी कि बिंदास हंसते-खेलते ये युवा भारत के उज्जवल भविष्य की ओर संकेत करते हैं. लेकिन, अब उनके भी पत्थरबाज होने की संभावना हो गयी है. इस हालात पर भारतीय संस्कृति का यशगान करनेवालों और उसका लाभ लेकर सत्ता सुख भोगनेवालों को सचेत होना चाहिए. यह न राष्ट्र के लिए, और न ही उनके लिए शुभ संकेत है.
भारतीय दर्शन के अनुसार, मनुष्य मूलतः अपने पुरुषार्थ प्राप्ति में अनुरंजित रहता है. अर्थ, काम, धर्म, मोक्ष ही उसके जीवन का उद्देश्य होता है. लेकिन, उसके स्वभाव का दूसरा हिस्सा विकार है. काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, ईर्ष्या, ये विकार भी उतने ही स्वाभाविक हैं. दार्शनिकों ने बहुत विचार किया है कि समाज में कैसे लोगों को पुरुषार्थ की प्राप्ति की ओर प्रेरित किया जाये और विकार से विमुख किया जाये. इसलिए उनका उद्देश्य रहा- ‘सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।’ अर्थात् सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुख का भागी न बनना पड़े. राज्य का उद्देश्य ऐसे समाज की स्थापना करना है, यही विकास का मतलब भी है. अब आधुनिक समाज में राज्य की भागीदारी इतनी बढ़ गयी है कि इस उद्देश्य की प्राप्ति में राज्य से परे कोई संस्था नहीं रह गयी है. इसलिए समाज में हिंसा के बढ़ने के लिए शुद्ध रूप से राज्य को ही जिम्मेवार मानना उचित होगा. फिर यदि शांत-बिंदास छात्र हिंसक भीड़ में बदल जाये, तो इसके लिए कौन जिम्मेवार है? यदि समाज में किसी व्यक्ति को एक समूह मिल कर सरेआम जान से ही मार डाले, तो हम किसे जिम्मेवार मानेंगे.
चार-पांच वर्ष पहले दिल्ली विवि में एक सभा को संबोधित करते हुए मेधा पाटकर ने कहा था कि कल तक सरकार का जो तानाशाही रवैया किसानों, आदिवासियों और मजदूरों के साथ था, अब विश्वविद्यालयों के साथ भी कुछ वैसा ही हो रहा है.
राज्य की अस्मिता जनता में उसकी स्वीकृति पर निर्भर करती है और स्वीकृति राज्य के जनकल्याण की क्षमता पर निर्भर है. यदि राज्य और सरकार की नीयत पूंजी और पूंजीपतियों का कल्याण हो जाये, तो जनकल्याण किनारे लग जाता है और जनता में उसकी स्वीकृति कम हो जाती है और छात्रों, किसानों, मजदूरों, आदिवासियों और पुरुषार्थ का अधिकार मांगनेवाले हर किसी को देशद्रोही कहने की नौबत आ जाती है. यह खतरनाक स्थिति है.
इससे बचने के लिए सरकार चाहे कितना भी मोहिनी मंत्र का उपयोग करे, उसकी नीयत की भनक आम लोगों को लगते ही विप्लव का होना तय है.
सुबह का अखबार बलात्कार, हिंसा, भीड़ द्वारा सामूहिक हिंसा, लाठी चार्ज, गोली चार्ज, आत्महत्या, धोखा जैसी खबरों से भरा होता है. हम विश्व शक्ति बनने का ख्वाब देखते हैं और विकारपूर्ण समाज का निर्माण भी कर रहे हैं. दोनों साथ नहीं चल सकता है. डर के साम्राज्य में रहते हुए विश्वगुरु बनने की उम्मीद न ही रखें, तो बेहतर है. कोई सरकार या समाज अपने युवाओं को स्वप्नदर्शी बनाने के बदले यदि देशद्रोही घोषित करता रहे, तो उसके भविष्य को खतरे में मानना चाहिए. आदमी हिंसक तभी होता है, जब उसकी उम्मीदें मर जाती हैं.
इसलिए असली हिंसक वह है, जो उनकी उम्मीदों की हत्या करता है. मनुष्य ने राज्य की कल्पना ही सुरक्षा के लिए की है. इसलिए यदि राज्य या सरकार से कोई असुरक्षित महसूस करता है, तो यह राजधर्म के खिलाफ है.
सवाल है कि लोग असुरक्षित क्यों महसूस करते हैं. यदि संसाधनों पर कुछ ही लोगों का अधिकार हो और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी मौलिक सुविधाओं के लिए लोग बाजार पर निर्भर होने लगें, जीवकोपार्जन के साधनों को सरकार ही छीनने लगे, तो असुरक्षा स्वाभाविक है. यदि मेरी सुरक्षा मेरी जाति या धार्मिक समुदायों की संख्या पर निर्भर करे, तो हम आधुनिक समाज में रहने का दंभ न भरें, तो बेहतर है. ऐसे समाज में हिंसा का ही साम्राज्य होगा. ऐसा न हो कि आनेवाले समय में हम आपस में लड़ें और लड़ते-लड़ते खत्म हो जायें.
एक भारी बहुमत की सरकार को ‘सर्वे सुखिनः संतु’ के भारतीय आदर्श के लिए काम करना चाहिए. समाज में शांति और सहअस्तित्व के लिए राष्ट्रकवि दिनकर की ये पंक्तियां सूत्र वाक्य की तरह उपयोगी हो सकती हैं: ‘शांति नहीं तब तक जब तक सुख भाग न नर का सम होगा, नहीं किसी को बहुत अधिक हो नहीं किसी को कम होगा.’
