किसी समुदाय में रहने के कुछ अदब-कायदे होते हैं. आप इन अदब-कायदों का अपना हित चेतकर उल्लंघन करें और साथ ही उस समुदाय का सदस्य भी बने रहना चाहें, ये दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं. जो बात सामुदायिक जीवन पर लागू होती है, वही राष्ट्रों के जीवन पर भी.
बेशक हर राष्ट्र को अपनी जमीन की किसी घटना पर स्वतंत्र फैसले का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार की भी मर्यादाएं हैं. यह ध्यान रखना होता है कि राष्ट्र होना अकेले की बात नहीं, बल्कि यह मुल्कों की अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में शामिल होने पर भी समान रूप से निर्भर है. मुल्कों की अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में शामिल रहने के कुछ नियम-कायदे हैं और कोई भी मुल्क इनका उल्लंघन करके कोई फैसला ले, तो उसके अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के जिम्मेवार सदस्य होने की काबिलियत पर सवाल उठाये जाने चाहिए.
भारतीय नौसेना के रिटायर्ड अधिकारी कुलभूषण जाधव के मामले में पाकिस्तान के बरताव को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए. साल भर पहले बलूचिस्तान में कुलभूषण जाधव को पाकिस्तानी सैन्य-तंत्र ने जिस तरह कब्जे में लिया, उसे कोई भी सभ्य मुल्क गिरफ्तारी की संज्ञा नहीं देगा. यह सीधे-सीधे एक विदेशी नागरिक को अगवा करने की कार्रवाई थी. अगवा करने के बाद जाधव पर जासूसी के आरोप मढ़े गये और पाकिस्तानी सैन्य-अदालत ने गुपचुप मुकदमा चला कर मात्र एक साल के भीतर फांसी की सजा भी सुना दी. किसी विदेशी नागरिक को फांसी की सजा सुनाने के मामले में ऐसी हड़बड़ी का परिचय शायद ही किसी सभ्य मुल्क ने दिया हो. पाकिस्तान फांसी की सजा के पक्ष में जो सबूत पेश कर रहा है, उसे अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ लचर बता रहे हैं.
एक तो कोई भी मुल्क जासूसी के मिशन पर अपने सैन्य-अधिकारी को उसकी वास्तविक नागरिकता जाहिर करनेवाले पासपोर्ट के साथ नहीं भेजता, दूसरे जाधव के इकबाले-जुर्म का वीडियो भी विशेषज्ञों की नजर में कत्तई विश्वसनीय नहीं. अपनी आतंकी जमातों पर काबू ना कर पाने की विफलता के बीच अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की कोशिशों से अलग-थलग पड़ता पाकिस्तान कुलभूषण जाधव के बहाने भयादोहन की राजनीति पर उतारू है.
भारत ने आपा ना खोते हुए मामले को न्याय के अंतराष्ट्रीय मंचों पर ले जाने की बात कह कर समझदारी भरा कदम उठाया है. अगर पाकिस्तान की सरकार दुनिया के महत्वपूर्ण देशों की नजर में आगे और अविश्वसनीय नहीं होना चाहती और अपने मुल्क में लोकतंत्र की हिफाजत के लिए सचमुच प्रतिबद्ध है, तो उसे जाधव के मामले में इंसाफ के अंतरराष्ट्रीय नियम-कायदों का हर हाल में पालन करना चाहिए.
