जीवन लिखा जाता है

प्रभात रंजन कथाकार इस बात से खुशी हुई कि लेखक अज्ञेय की पहली आधिकारिक जीवनी अंगरेजी में लिखी जा रही है. अज्ञेय के शिष्यों में एक लेखक मनोहर श्याम जोशी अक्सर कहा करते थे कि हिंदी में ऐसे लेखक बहुत कम हुए हैं, जिनका जीवन बायोग्राफी प्वॉइंट ऑफ व्यू’ से भी जानदार रहा है. अज्ञेय […]

प्रभात रंजन
कथाकार
इस बात से खुशी हुई कि लेखक अज्ञेय की पहली आधिकारिक जीवनी अंगरेजी में लिखी जा रही है. अज्ञेय के शिष्यों में एक लेखक मनोहर श्याम जोशी अक्सर कहा करते थे कि हिंदी में ऐसे लेखक बहुत कम हुए हैं, जिनका जीवन बायोग्राफी प्वॉइंट ऑफ व्यू’ से भी जानदार रहा है.
अज्ञेय उनमें से एक हैं.
इस जीवनी का लेखन अक्षय मुकुल कर रहे हैं, जिन्होंने गीता प्रेस पर अंगरेजी में एक प्रमाणिक पुस्तक लिखी है. लेकिन, दुख इस बात का हुआ कि यह जीवनी हिंदी में नहीं लिखी जा रही है.यह दुख कई हिंदी वालों काे होगा कि हिंदी में इतनी कम जीवनियां क्यों लिखी गयी हैं? हिंदी के मूर्धन्य लेखकों के जीवन के बारे में बहुत कम लिखा गया है. मसलन, ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी के जीवन के बारे में कितने लोग जानते हैं? हिंदी गद्य को आधुनिक रूप देने में उनकी जो महती भूमिका है, क्या उसको सामने नहीं आना चाहिए? हिंदी के पहले बोहेमियन लेखक भुवनेश्वर को कितने लोग जानते हैं? जिन्हें कभी प्रेमचंद ने हिंदी कहानी का भविष्य कहा था.
हिंदी के बड़े लेखकों की फिर भी कुछ जीवनियां मिल जाती हैं, लेकिन मुझे याद नहीं आता है कि मैंने किसी लेखिका की जीवनी पढ़ी हो. सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ‘झांसी की रानी’ शायद ही किसी हिंदी वाले ने न पढ़ी हो, लेकिन उनके जीवन के बारे में कितने लोगों काे पता है? आधुनिक मीरा कही जानेवाली महादेवी वर्मा की कविताओं में प्रेम की पीड़ा, उनके रहस्यवाद और उनके जीवन के सूत्रों को जोड़ने की कोई ईमानदार कोशिश हिंदी में हुई है?
अब भी हिंदी में अच्छी जीवनियों की सूची बनायें, तो मुश्किल से यह संख्या दस तक पहुंच पायेगी. प्रेमचंद की जीवनी ‘कलम का सिपाही’, भारतेंदु हरिश्चंद्र की ‘प्यारे हरिचंद जू को’ आदि. लेकिन, जो जीवनी हिंदी में आदर्श जीवनी की तरह देखी मानी जाती है, वह बांग्ला के मूर्धन्य लेखक शरतचंद्र की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ है. विष्णु प्रभाकर ने एक दशक से अधिक समय के शोध के बाद इस जीवनी का लेखन किया था. लेकिन, यह परंपरा नहीं बन पायी. विश्वनाथ त्रिपाठी ने ‘व्योमकेश दरवेश’ के नाम से हजारी प्रसाद द्विवेदी की जीवनी लिखी तो है, लेकिन आज भी यह विधा हिंदी में समृद्ध नहीं हो पायी है.
इस समय इस विधा को लेकर चिंता बढ़ गयी है, क्योंकि आज लेखकों-प्रकाशकों का जोर बिकाऊ साहित्य को लेकर रहता है.ऐसे में जीवनी जैसी श्रमसाध्य विधा में न तो लेखक दिलचस्पी दिखा रहे हैं न ही प्रकाशक. जीवनी साहित्य से किसी भी भाषा के साहित्य के ऐतिहासिक धरोहर और उसकी ऐतिहासिक समृद्धि का पता चलता है. क्या आनेवाले समय में हिंदी अपने आपको अपने विशाल ऐतिहासिक धरोहर से काट लेगा? यह खतरा दिखाई देने लगा है.

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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