सुप्रीम कोर्ट का अच्छा कदम

मनीषा प्रियम राजनीतिक विश्लेषक भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में, जहां संसद और चुनावों की जनमानस में एक अहमियत है, वहीं नागरिक अधिकारों तथा नैतिक मामलों पर सुप्रीम कोर्ट से लोगों की आस बंधी रहती है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर ने जब यह निर्णय लिया कि उच्चतम न्यायालय का संविधान पीठ […]

मनीषा प्रियम
राजनीतिक विश्लेषक
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में, जहां संसद और चुनावों की जनमानस में एक अहमियत है, वहीं नागरिक अधिकारों तथा नैतिक मामलों पर सुप्रीम कोर्ट से लोगों की आस बंधी रहती है.
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर ने जब यह निर्णय लिया कि उच्चतम न्यायालय का संविधान पीठ गरमी की छुट्टियों में भी बंद नहीं होगा, परंतु कुछ आम मामलों पर सुनवाई जारी रखेगा, तब एक तरह से सर्वोच्च संस्था और नीतिगत मामलों पर उसके रवैये की बात फिर से सुर्खियों में आ गयी है. गौरतलब है कि अब प्रधान न्यायाधीश के निर्णय पर अमल करना होगा. इन दो महीनों के दौरान उच्च न्यायालय के 17 न्यायाधीश काम पर रहेंगे. इनमें से पांच-पांच न्यायाधीशों वाली तीन संविधान बेंच होंगी और दो न्यायाधीशों वाली एक रेग्युलर बेंच होगी.
आम तौर पर यह समझा जाता है कि न्यायालय में जाने का अर्थ है कि आज की सुनवाई कल पर टाल दी जायेगी और बीच में अगर गरमी की छुट्टी आ गयी, तो मामले पर सुनवाई दो महीने बाद ही होगी. लेकिन, जस्टिस खेहर के फैसले के बाद फिर से यह दिखता है कि अहमियत वाले मामलों को नजरअंदाज करने के मूड में सुप्रीम कोर्ट नहीं है. जबकि पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस ठाकुर के कार्यकाल में न्यायालय के सामने गंभीर चुनौतियों के ब्योरे का जिक्र तो अक्सर हुआ, लेकिन कई अहम मामलों पर न्यायालय ने फैसला लेने से या अपनी टिप्पणी भी दर्ज कराने से कन्नी काटी.
उस दौरान नीति के मामलों के विशेषज्ञ प्रताप भानू मेहता ने इसे ‘नीतिगत मामलों पर चुप्पी लगाये रखना’ नाम दिया था. नोटबंदी पर जस्टिस ठाकुर के कार्यकाल के अंतिम महीने में ना ही कोई टिप्पणी की गयी और ना ही सुनवाई किसी मियाद पर पहुंची. इसके ठीक विपरीत जस्टिस खेहर के कार्यकाल में कुछ छोटी-छोटी बातें सामने आयी हैं कि न्यायालय के क्रियाशील होने पर ध्यान आकर्षित होता है.
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में शराबबंदी पर एक कड़ा रुख अपनाया है और फैसला दिया है कि राष्ट्रीय एवं राज्यस्तरीय राजमार्ग (हाइवे) के पांच सौ मीटर की दूरी तक शराब के ठेके नहीं खोले जा सकेंगे.
जबकि पहले 220 मीटर की दूरी तय थी. होटल, पब, बार और शराब के ठेकेदारों की कड़ी लाबिंग के बावजूद इस मामले पर जस्टिस खेहर की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया. इस पीठ के बाकी जजों ने जस्टिस खेहर का समर्थन करते हुए यह भी माना कि केवल पहाड़ी क्षेत्र जैसे सिक्किम, मेघालय और हिमाचल में एवं कम आबादी वाले इलाकों में इस नियम पर ढील देने की इजाजत होगी. बाकी सभी जगह कड़ाई से 31 मार्च 2017 की अवधि को निर्णायक माना गया. इन राजमार्गों पर हादसे एवं दुर्व्यवहार को रोकने में कोर्ट का यह कड़ा रवैया बहुत ही दूरगामी होगा. और कहीं भी नफा-नुकसान की बातचीत या मौज-मस्ती के नजरिये से कोर्ट ने किसी तरह की ढील देने से मनाही की.
एक और महत्वपूर्ण कदम जो सुप्रीम कोर्ट ने उठाया है, वह है बीएस-3 उत्सर्जन मानकों वाले वाहनों की बिक्री पर रोक. 1 अप्रैल से देश में अब सिर्फ बीएस-4 वाहन ही बिक सकेंगे. इन वाहनों को बनानेवाली कंपनियाें हीरो, होंडा, टीवीएस और यामाहा ने कोर्ट के सामने अपनी गुहार रखी कि जिन दोपहियों का निर्माण हो चुका है, उन्हें बेचे जाने की इजाजत दी जाये. वहीं वाहन डीलरों ने कहा कि मौजूदा स्टॉक को बेच सकने की इजाजत दी जाये.
लेकिन, कोर्ट ने ‘राइट टू लाइफ’ का ब्योरा देते हुए कहा कि यह उचित कारण नहीं हो सकता कि नागरिकों की जान ही वातावरण के प्रदूषण के चलते ले ली जाये.
सुप्रीम कोर्ट ने अनुचित उत्पादन करनेवाले निजी क्षेत्र की वाहन कंपनियांे और शराब जैसी गैरजरूरी लेकिन बेहद मुनाफा देनेवाले उत्पाद, इन दोनों मामलों पर एक कड़ा रवैया अपनाया है. मानव जीवन के सुरक्षित निर्वहन हेतु यदि निजी क्षेत्र के भी नफा-नुकसान पर कड़ी कार्रवाई करनी हो, तो सुप्रीम कोर्ट और उसके न्यायाधीश डरते हुए नहीं दिखते हैं. सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाही में नागरिकों के अधिकार का चिंतन समाहित दिखता है.
यूं तो खंडपीठ या संविधान पीठ के कानूनी फैसले अलग-अलग दिशा में जा सकते हैं, लेकिन अगर नागरिक को यह दिखता है कि न्यायालय उचित कार्रवाई करने में चूकती नहीं है और नागरिक अधिकारों का संरक्षण निडर होकर करती है, तो कहीं न कहीं कई कमियों के बावजूद ‘इक्वलिटी बिफोर दि लॉ’ का संदेश बहुत गहरे स्तर तक जाता है. कानूनी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए छुट्टियों में काम करने का फैसला एक जरूरी कदम है. इस गरमी भारत के नागरिकों की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के उन निर्णयों पर टिकी रहेंगी, जो वह इस दौरान लेगा.

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