मार्च के अंत से ही प्रचंड गर्मी पड़ने लगी है और इसका कारण प्राकृतिक असंतुलन ही है. विकास और आधारभूत संरचनाओं के नाम पर पेड़ों की कटाई धड़ल्ले से जारी है और कटाई की संख्या के अनुकूल वृक्षारोपण नहीं हो पा रहा है. मौसम-वैज्ञानिकों के मौसम परिवर्तन के चेतावनियों के बावजूद हमने अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति का इतना शोषण कर लिया है कि प्राकृतिक उष्णता बढ़ी है.
चारों तरफ कंक्रीट फर्श वर्षा के जल को पुनः जमीन के अंदर जाने से रोकता है और बड़ी बड़ी अट्टालिकाएं हवा की गति को रोकती हैं. धुआं और गैसों के उत्सर्जन से वायुमंडल गर्म हो रहा है. यदि हम प्रकृति के कोप से बचना चाहते हैं तो एक ही राह शेष है–प्रकृति का संरक्षण करें और दोहन बंद करें.
मनोज ‘आजिज’, जमशेदपुर
