आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
कांग्रेस की वास्तविक समस्या क्या है? भारत का यह सबसे पुराना दल अब तक के अपने इतिहास के सबसे खराब स्थिति में पहुंच चुका है और खुद को पुनर्जीवित करने में अक्षम दिखाई दे रहा है. यह पार्टी अपने अवसान की ओर बढ़ रही है या किसी नये नेता द्वारा नवीनीकरण की राह देख रही है.
इस संदर्भ में जो पहली बात दिखायी दे रही है वह है अस्वीकार करना. कांग्रेस को इस बात का विश्वास है कि उसके ऊपर कोई स्थायी संकट नहीं है. ऐसा मानने के दो कारण हैं.
पहला, महज 34 महीने पहले ही कांग्रेस बहुमत के साथ भारत पर शासन कर रही थी. जब ऐसे कार्यकाल का अंत होता है, तो ऐसा सोचना स्वाभाविक है कि यह दौर अस्थायी है और वक्त आने पर मतदाता एक बार फिर कांग्रेस के पक्ष में आ जायेगा. दूसरा कारण, वैसी कोई भी पार्टी, जिस पर एक परिवार का नियंत्रण होता है, वहां दरबारी लोकप्रिय नहीं होते हैं. न तो उनके पास अपने नेतृत्व से सत्य कहने का कोई कारण होता है, न ही उन्हें जमीनी हकीकत का पता होता है, क्योंकि उनके ऊपर लोगों को अपने पक्ष में लामबंद करने का कोई दबाव नहीं होता है.
यहां दूसरी समस्या सही मायने में नेता की गैरहाजिरी की नहीं है, बल्कि दशा और दिशा की है. यह सत्य है कि नरेंद्र मोदी बेहद करिश्माई हैं. उनका नेतृत्व दूसरों को समर्पण के लिए प्रेरित करता है.
मोदी बहुत अच्छे कम्यूनिकेटर हैं. हालांकि, उनकी जो प्रमुख प्रतिभा है, वह कमतर कर देने की है, मतलब यह कि वे भारत की जटिल समस्या को कम करके पेश कर देते हैं, और वह भी बेहद सरल संरचना में. मसलन, वे कह सकते हैं कि कमजोर नेतृत्व के कारण ही आतंकवाद की समस्या है और वे उसे खत्म कर देंगे. जबकि वे ऐसा नहीं कर सकते, लेकिन इसके विरोध में कोई बात नहीं कही जाती. यहां तक कि उनकी नोटबंदी की नीति, जिसने प्रत्येक भारतीय को बुरी तरह प्रभावित किया, उसे भी कालाधन, आतंकवाद और जाली नोट के खिलाफ बड़ी जीत के तौर पर प्रभावी तरीके से भुनाया गया.
मजबूत और अकाट्य बात कहने की राहुल गांधी की अयोग्यता, उनकी सबसे बड़ी असफलता है. जनता के बीच बोलते हुए उनकी सुस्ती तो कम महत्व की बातें हैं. उनके पास इतनी भी योग्यता नहीं है कि वे कांग्रेस की सफलता, मनरेगा और आधार पर मोदी के पीछे हटने को अपना कह कर पेश कर सकें.
कांग्रेस की तीसरी समस्या जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता की अनुपस्थिति है. भाजपा के पास जमीनी स्तर पर काम करने के लिए अारएसएस के कार्यकर्ता हैं. ये लाखों में हैं और अधिकतर बेहद प्रतिबद्ध हैं.
कुछ वर्ष पहले तक हम स्वतंत्रता सेनानी शब्द सुना करते थे, ये शब्द जिन लोगों के लिए इस्तेमाल होते थे, वे प्रत्यक्ष तौर पर युद्ध में शामिल नहीं थे, लेकिन वे कांग्रेस के आंदोलन में भागीदार के जरिये अंगरेजों का विरोध करते थे.
जो लोग 1930 के दशक के मध्य में पैदा हुए थे, वे स्वतंत्रता के लिए लड़नेवाली पार्टी कांग्रेस से जुड़ाव की वजह से नेहरू और उसके बाद इंदिरा के साथ जुड़े रह सकते थे, लेकिन 1980 के दशक तक ‘कांग्रेस कार्यकर्ता’ नामक यह वर्ग विलुप्त होने लगा था और आज इसका अस्तित्व ही नहीं है. इस पार्टी के पास हिंदुत्व या साम्यवाद जैसी कोई विचारधारा नहीं है, और न ही कोई खास तौर से प्रतिबद्ध सामाजिक आधार है, जैसा कि मायावती या असदुद्दीन आेवैसी के पास दलित व मुसलिम हैं. आज बहुत कम लोगों के पास कांग्रेस के पक्ष में लोगों को एकजुट करने का उत्साह है. इस सच के कारण स्थानीय कांग्रेसी नेताओं ने अपने पैसों से समर्थन खड़ा करना होगा.
यहां से बात संसाधन की समस्या से जुड़ती है. चुनाव में भारी मात्रा में नकदी की जरूरत होती है. यह धन दो तरीके से आता है. पार्टियां धन एकत्र करती हैं. यह धन चंदा, सदस्यता शुल्क या भ्रष्टाचार से आता है. इनमें से कुछ धन उम्मीदवार को दिया जाता है और कुछ विज्ञापन, यात्रा, रैली में लगनेवाले पैसे आदि के लिए भेजे जाते हैं. दूसरा तरीका यह होता है कि उम्मीदवार अपने चुनाव के खर्चे खुद उठाये. यह कोई रहस्योद्घाटन नहीं कि विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए 10 करोड़ से अधिक और लोकसभा के लिए इससे कहीं अधिक धन की जरूरत होती है.
आज केवल दो बड़े राज्यों में कांग्रेस का शासन है- कर्नाटक (जहां अगले वर्ष होनेवाले चुनाव में इसके हारने की संभावना है) और पंजाब. इन दोनों ही राज्यों से इतना पैसा नहीं आता, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी चलायी जा सके. जिन उम्मदवारों को कांग्रेस टिकट देती है, वे अपना धन अधिक खर्च नहीं करते, क्योंकि हार के लिए कोई क्यों बड़ी रकम निवेश करना चाहेगा?
इन कारणों से कांग्रेस के अवसान की स्थिति पैदा हुई है. वह राष्ट्रीय स्तर पर सिकुड़ रही है, क्योंकि वह राज्यों को गंवा चुकी है. यहां तक कि दो दलीय राजनीति वाले राज्यों, जैसे गुजरात- जहां कांग्रेस विपक्ष में है, वहां भी यह चुनाव नहीं जीत सकती है. शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह सरकार का वर्तमान कार्यकाल जब समाप्त होगा, तब तक मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से कांग्रेस को सत्ता से बाहर हुए 15 वर्ष हो चुके होंगे. यहां स्थायी तौर पर कांग्रेस का विपक्ष में रहना तय दिख रहा है. दूसरे राज्यों जैसे ओडिशा और अभी पश्चिम बंगाल में और पहले से ही उत्तर प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु में इसने एक अर्थपूर्ण विपक्षी पार्टी का दर्जा खो दिया है.
ऐसी पार्टियां नये नेतृत्व से पुनर्जीवित नहीं हो सकतीं, बल्कि इसके लिए इन्हें नये संदेश और जीवंत बने रहने के कारणों की जरूरत होती है. वर्ष 2017 में कांग्रेस किसी भी सकारात्मक बात के पक्ष में खड़ी नहीं दिखती, धर्मनिरपेक्षता के लिए भी नहीं. ऐसी पार्टियां, जिनके पास न मूल्य हैं और न कोई विश्वसनीयता, उनके अस्तित्व में बने रहने या खत्म होने की कोई संभावना नहीं होती है, जैसा कि कांग्रेस को अब महसूस हो रहा है.
