आओ लौटें भूलते साहित्य की ओर

कला विशेषतः साहित्य के ऐसे रिश्ते को परवान चढ़ाते हैं, जिसका अंदाजा उन लोगों को भी अक्सर बहुत देर में और बहुत खामोश तौर पर होता है, जो खुद इस रिश्ते में लगातार जुड़े हुए हैं. जैसे गालिब – गुलजार, दुष्यंत -दिनकर, प्रेमचंद और दूसरी जुबानों के सभी बड़े साहित्यकारों से हमारे रिश्ते कुछ ऐसे […]

कला विशेषतः साहित्य के ऐसे रिश्ते को परवान चढ़ाते हैं, जिसका अंदाजा उन लोगों को भी अक्सर बहुत देर में और बहुत खामोश तौर पर होता है, जो खुद इस रिश्ते में लगातार जुड़े हुए हैं.
जैसे गालिब – गुलजार, दुष्यंत -दिनकर, प्रेमचंद और दूसरी जुबानों के सभी बड़े साहित्यकारों से हमारे रिश्ते कुछ ऐसे ही जुड़ते हैं कि हम उनके वजूद से खुद को और अपने वजूद से उनको निकाल नहीं सकते. हम उनके साथ साथ जिंदा रहते हैं और हर आने वाली नयी पीढ़ी खुद ही उनसे जुड़ जाती है, और यही कला की खूबी और खासियत है. इसलिए कोशिश होनी चाहिए की वर्तमान में हो रही अवसरवादी राजनीति से थोड़ा हट कर हम अगर कुछ साहित्य पढ़ लें, तो हम अच्छी राजनीति समझ पाएंगे.
विशेष चंद्र ‘नमन’, राजधनवार, गिरिडीह

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