पुष्पेश पंत
वरिष्ठ स्तंभकार
पहले भी विदेशों में रहनेवाले भारतीय छिटपुट नस्लवादी हिंसा का शिकार होते रहे हैं, परंतु इधर जिस तरह निरीह भारतीय अमेरिका में मारे जा रहे हैं, उससे लगता है कि इस बार यह बीमारी कहीं अधिक घातक है.
एक हद तक यह विश्लेषण जायज है कि ट्रंप की जीत ने उन तत्वों का हौसला बढ़ाया जो रंगभेदी, नस्लवादी अौर असहिष्णु थे, पर अब तक खुल कर सामने आने से कतराते थे. वास्तव में ट्रंप का राष्ट्रपति बनना तो बहाना है- अमेरिका हो या इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया हो या जर्मनी जैसा यूरोपीय देश- ‘बाहर से आनेवाले’ आप्रवासियों को बहुसंख्य स्थानीय गोरे-ईसाई नागरिक संदेह की नजर से ही देखने के आदी हैं. अपनी कमजोरी या खामियों के लिए इनको जिम्मेवार ठहराना आसान है. अपनी सांस्कृतिक पहचान या राष्ट्रीय जीवन शैली, जीवन स्तर के लिए विदेशियों/शरणार्थियों को दोष देना चाहे कितना ही गलत हो, आर्थिक मंदी की चपेट में बेरोजगार इस कुतर्क को स्वीकार करने के लिए उतावले दिखयी देते हैं.
विडंबना यह है कि जब तक यह आक्रोष सीरिया, इराक, अफगानिस्तान जैसे इसलामी देशों के शरणार्थियों के विरुद्ध खौल रहा था, भारत में हमको लगता था कि यह हमारे हित में है, क्योंकि इससे पाकिस्तान की नाक में नकेल कसी जा सकेगी. आज यह भरम पालना संभव नहीं.
भले ही ट्रंप एक भारतीय इंजीनियर की हत्या को ‘चिंताजनक’ घटना कबूल कर चुके हैं, पर इस स्वीकारोक्ति से समस्या का समाधान नहीं हो सकता. यदि उनका प्रशासन सख्त कदम उठाता है, तो उसे इस बात के लिए तैयार रहना होगा कि ट्रंप समर्थकों में असंतोष पनपेगा, जो सरदर्द बन सकता है. इस बार यह बात अौर भी दुखद है कि भारतीयों के प्रति रोष गोरों तक सीमित नहीं. खुद रंगभेद अौर नस्लवाद के शिकार अश्वेत अमेरिकी भूरे भारतीयों को खदेड़ते यह चिल्लाते सुने जा रहे हैं- ‘मेरा देश छोड़ो- वापस जाअो जहां से आये हो!’ इन्हें लगता है कि इनकी रोजी-रोटी इन बिन बुलाये मेहमानों ने ही छीनी है.
हमारी समझ में यह सुझाना बेकार है कि भारतीय लगभग सभी जगह स्थानीय मेजबानों से अधिक परिश्रमी, बेहतर शिक्षित अौर कम वेतन/मजूरी पर काम करने को तैयार रहते हैं, इसीलिए पूंजीवादी व्यवस्था में उनकी जगह बनती है. इन्हें बिन बुलाया मेहमान नहीं कहा जा सकता.
इसके साथ ही यह दलील भी किसी के लिए कवच नहीं बन सकती कि मुट्ठी भर ही सही, सुयोग्य भारतीय नासा के वैज्ञानिकों का बड़ा हिस्सा हैं तथा सिलिकॉन वैली में अौर मशहूर बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सीइअो के पद पर विराजमान हैं. इससे भी बहुत दिलासा नहीं मिलती कि कुछ भारतीय अमेरिका के किसी राज्य में गवर्नर हैं या सीनेटर चुने जा चुके हैं. इनकी उपलब्धियां उन बेचारे भारतीयों की जान का खतरा बढ़ाती ही हैं, जो अपनी हिफाजत का खर्च बर्दाश्त नहीं कर सकते. वे उन इलाकों में रहने को मजबूर हैं, जिनका परिवेश आपराधिक हिंसा को ही बढ़ावा देता है अौर जहां प्रवेश से पुलिसकर्मी भी हिचकते हैं.
शीत युद्ध के दौर से ही यह बात जगजाहिर रही है कि उदारता के विराट दिखावे के बावजूद अमेरिकी समाज घोर असहिष्णु है- वह असहमति को स्वीकार नहीं करता अौर हथियारबंद कट्टरपंथी अपने प्रतिपक्षी का खात्मा करने में देर नहीं लगाते. समलैंगिक हों या हिस्पानी अथवा यहूदी या महिलाएं- अश्वेतों की तरह ये तबके उत्पीड़ित-शोषित रहे हैं. क्रूर मजाक तो यह है कि जो यह नारा बुलंद कर रहे हैं कि ‘मेरा देश छोड़ो!’ वे यह भूल रहे हैं कि वह भी किसी के देश में आदिवासियों का वंशनाश कर ही बसे हैं. अमेरिका की राष्ट्र-राज्य के रूप में स्थापना करने का दंभ पालनेवाले भी तीन सौ साल से कुछ ही पहले ‘शरणार्थी’ के रूप में यहां पहुंचे थे.
एक अौर बात की ओर ध्यान दिलाने की जरूरत है. अमेरिका के सार्वजनिक जीवन में पागल हिंसा को तब तक रोकना-थामना असंभव है, जब तक बंदूकें रखने के बुनियादी अधिकार को सीमित नहीं किया जाता. यह बहस आज सिर्फ अमेरिकी नागरिकों के जीवन-मरण से जुड़ी हुई नहीं है, बल्कि अमेरिका में रहनेवाले सभी छात्रों, वहां काम करनेवालों तथा पर्यटकों की जिंदगी का सरोकार बन चुकी है. यह भी याद रखने की जरूरत है कि जब भारतीय राजनेताअों, राजनयिकों को नस्लवादी पड़ताल-जामातलाशी का सामना करना पड़ा था, तब अमेरिका की दोस्ती के लालच में इन अशुभ संकेतों को अनदेखा किया गया था.
इन घटनाअों की उपेक्षा भविष्य में अौर भी बड़ा जोखिम पैदा कर सकती है. अमेरिकी विश्वविद्यालय हों या कंपनियां उनके लिए यह समझना जरूरी है कि नस्लवादी हिंसा की बड़ी कीमत उन्हें भी चुकानी पड़ सकती है.
इस मुद्दे पर चुप्पी साधना बुद्धिमानी नहीं. इस बाबत भी सतर्क रहें कि हमें कटघरे में खड़ा करने का जबर्दस्त प्रयास किया जा सकता है- हम क्यों नहीं अपने दामन में झांकते अौर अल्पसंख्यकों, महिलाअों, आदिवासियों, दलितों के प्रति हिंसा का प्रतिकार नहीं करते. बहस देर तक चलेगी इस दौरान सरकार को अपने प्रवासी तथा भारत वंशी नागरिकों की रक्षा के लिए अभूतपूर्व राजनयिक सक्रियता दिखलानी होगी.
