बढ़ते तापमान की चिंता

धरती का बुखार बेहद गंभीर तरीके से बढ़ रहा है. इसका असर अब मौसम और जलवायु के मिजाज पर बिल्कुल स्पष्ट रूप से दिखने भी लगा है तथा इससे हवा, पानी और जमीन तीनों ही अभूतपूर्व तरीके से प्रभावित हो रहे हैं. मौजूदा सदी के शुरुआती 16 वर्षों की छोटी अवधि में सालाना वैश्विक तापमान […]

धरती का बुखार बेहद गंभीर तरीके से बढ़ रहा है. इसका असर अब मौसम और जलवायु के मिजाज पर बिल्कुल स्पष्ट रूप से दिखने भी लगा है तथा इससे हवा, पानी और जमीन तीनों ही अभूतपूर्व तरीके से प्रभावित हो रहे हैं.
मौजूदा सदी के शुरुआती 16 वर्षों की छोटी अवधि में सालाना वैश्विक तापमान का कीर्तिमान एक-दो बार नहीं, बल्कि पांच बार वर्ष 2005, 2010, 2014, 2015 और 2016 में टूट चुका है. वर्ष 2016 में दर्ज किया गया तापमान 20वीं सदी के औसत तापमान से 1.69 फॉरेनहाइट (0.94 सेल्सियस) अधिक था. संयुक्त राष्ट्र के विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की रिपोर्ट में अंटार्कटिका के तीन क्षेत्रों में उच्चतम तापमान दर्ज किये जाने का जिक्र है, जो यह सोचने पर विवश करता है कि कैसे हमारे ग्रह का सबसे बड़ा हिमाच्छादित क्षेत्र जलवायु परिवर्तन का शिकार बन रहा है.
महाद्वीप के उत्तरी सिरे पर स्थित अंटार्कटिका प्रायद्वीप का उच्चतम तापमान 24 मार्च, 2015 को 17.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है. लगभग 4.8 किमी तक मोटी बर्फ की चादर से ढका ऑस्ट्रेलिया के आकार से लगभग दोगुने इस क्षेत्र में दुनिया के 90 फीसदी ताजे जल का संग्रहण है. बढ़ते तापमान के प्रभावों में घिरे इस क्षेत्र के स्वरूप बदलने से समुद्र का स्तर कई मीटर ऊपर उठ सकता है. ग्रीन हाउस गैसों के अनियंत्रित उत्सर्जन से वातावरण तबाही की कगार पर है. मुख्य रूप से तीन गैसों- कॉर्बन-डाइऑक्साइड, मीथेन और जलवाष्प की बढ़ती सांद्रता की वजह से तापमान में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.
ओजोन परत के क्षरण और वैश्विक तापन के लिए कॉर्बन-डाइऑक्साइड गैसों से कहीं ज्यादा खतरनाक हाइड्रोफ्लोरोकॉर्बन है, जिसका उत्सर्जन सलाना 10 प्रतिशत की गति से बढ़ रहा है. हालांकि, भारत समेत 197 देशों ने किगाली समझौते के तहत 2045 तक हाइड्रोफ्लोरोकॉर्बन को 85 प्रतिशत तक कम करने की प्रतिबद्धता जतायी है. किगाली, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल और पेरिस जलवायु समझौते निश्चित ही वैश्विक तापन को रोकने की दिशा में उठाये गये सराहनीय कदम हैं, लेकिन समृद्ध देशों के साथ-साथ उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों को बड़ी और रचनात्मक भूमिका के लिए आगे आना होगा.
धरती के बढ़ते तापमान की सच्चाई से अब मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है. धरती सबकी है, इसलिए जिम्मेवारी भी सामूहिक है. विकास की आपाधापी में पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षा के प्रति लापरवाही पूरी धरती के विनाश का कारण बन रही है. ऐसे में यह जरूरी है कि सभी देश ईमानदारी से अपनी जवाबदेही और जिम्मेवारी का निर्वाह करें. समाजों और नागरिकों को भी इस कोशिश में पूरा योगदान देना होगा.

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