प्रबंधन के बूते लड़ाई तो जीती जा सकती है, लेकिन युद्ध जीतने के लिए दम-खम और हौसले की जरूरत होती है. नोटबंदी के मसले पर सरकार का रवैया कुछ ऐसा ही है. सरकार नोटबंदी के असर को नकारने में सफल जान पड़ रही है, लेकिन इस नकार पर जोर इतना ज्यादा है कि अर्थव्यवस्था के बाकी संकेतों पर उसका ध्यान ही नहीं जा रहा. दुनियाभर के प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने नोटबंदी की आलोचना की और कहा कि इस फैसले के पीछे दूरंदेसी का अभाव था, सो भारतीय अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी का नकारात्मक असर पड़ेगा. अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रमुख आर्थिक मंचों और रेटिंग एजेंसियों ने भी माना कि भारत की अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी का असर पड़ेगा और ठीक इसी कारण अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने चालू वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी वृद्धि दर के 6 फीसद रहने का अनुमान लगाया था.
शायद नोटबंदी को लेकर अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मंचों पर भारत की बनती नकारात्मक छवि से चिंतित सरकार प्रबंधन कौशल के जरिये साबित करना चाहती है कि इसका भारत की आर्थिक वृद्धि दर पर कोई खास बुरा असर नहीं पड़नेवाला है. वित्त मंत्री ने बजट-भाषण में कृषि-उत्पादन के आंकड़ों के जरिये, तो प्रधानमंत्री ने 31 दिसंबर के भाषण में रबी की बुवाई के रकबे में बढ़ोत्तरी के तथ्य के जरिये देश को समझाना चाहा कि नोटबंदी का भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर नहीं हुआ है. यही बात तीसरी तिमाही (अक्तूबर-दिसंबर 2016) के आंकड़ों के जरिये कही जा रही है. केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के नये आंकड़ों में कहा गया है कि तीसरी तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर 7 फीसदी रही.
यह जुलाई-सितंबर के 7.4 फीसदी से भले कम हो, लेकिन उतनी भी कम नहीं, जितने की आशंका जतायी गयी थी. नोटबंदी के असर को नकारनेवाले इन आंकड़ों के पक्ष में फिलहाल वही बात कही जा सकती है, जिसकी तरफ प्रधानमंत्री ने संसद में इशारा किया था. प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के सवाल पर संसद में कहा था कि फैसला तीज-त्योहारों के बाद के समय में लिया गया, सो बाजार में उपभोक्ता वस्तुओं की खरीदारी पर ज्यादा असर नहीं पड़ा.
फास्ट मूविंग कंज्यूम गुड्स की खरीदारी नये आंकड़ों में बेशक बढ़े हुए दिख रहे हैं, लेकिन क्या नये आंकड़ों के सहारे यह पता किया जा सकता है कि अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक क्षेत्र की उत्पादक गतिविधियों पर क्या असर पड़ा. एक अमेरिकी अर्थशास्त्री ने कहा भी है कि भारत का अर्थतंत्र इसके बारे में अनुमान लगाने में सक्षम नहीं. नोटबंदी के असर को सरकार भले नकारे, लेकिन विदेशी पूंजी के पलायन से लेकर रोजगार तक के आंकड़े यह बताने के लिए काफी है कि नोटबंदी का फैसला अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए ठीक साबित नहीं हुआ.
