विस्थापित गजराज

आजकल आये दिन सुनने में आ रहा है कि अमुख रात को अमुख गांव में जंगली हाथियों ने उत्पात मचाया. घरों को तोड़ा, फसलों को खाया. आखिर क्यों? क्यों उन्होंने ऐसा किया या ऐसा कर रहे हैं? क्योंकि कहा जाता है कि भूखा क्या नहीं कर सकता है. ठीक यही दयनीय दशा हमारे गजराजों की […]

आजकल आये दिन सुनने में आ रहा है कि अमुख रात को अमुख गांव में जंगली हाथियों ने उत्पात मचाया. घरों को तोड़ा, फसलों को खाया. आखिर क्यों? क्यों उन्होंने ऐसा किया या ऐसा कर रहे हैं? क्योंकि कहा जाता है कि भूखा क्या नहीं कर सकता है. ठीक यही दयनीय दशा हमारे गजराजों की भी है. आज जंगल पर जंगल कट रहे हैं. विकास के नाम पर पहाड़ों को उजाड़ रहे हैं. उनके नहाने-पीने के जलाशयों पर जल परियोजनाएं बना रहे हैं.
हमारे कुछ लोग गांव शहर छोड़ कर गजराजों के निवास स्थानों को अपना निवास स्थान बना लिया है. सर्च अभियान के नाम पर गोलियों, बम-बारूद की दिन रात वर्षा हो रही है. ऐसे में बेचारे जंगली जानवर और गजराज रहें भी तो कहां रहें? 60 के दशक में पश्चिम सिंहभूम का सुरक्षित शरणस्थल सारंडा था, पर आज वहां मूर्ख मानव जाति का बसेरा बन गया है.
बेचारों को विस्थापित कर दिया गया है. अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने से तो चोट लगेगी ही. जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे. अत: जब तक हम उन बेचारों को आवश्यक सुख सुविधा मुहैया नहीं करायेंगे, ऐसा ही होता रहेगा. सबका अपना-अपना क्षेत्र है. अतिक्रमण कभी नहीं करना है.
पी बोदरा, चक्रधरपुर

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