आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
नोटबंदी के बाद दो हजार के नोट जारी किये जाने के कुछ ही सप्ताह के बाद से इसके नकली नोट भी बरामद होने शुरू हो गयेे हैं. इस तरह के जाली नोट सबसे पहले नवंबर महीने में गुजरात में पकड़े गये थे. और अब देशभर से इस तरह के नकली नोट मिलने की खबरें आ रही हैं.
हमसे ऐसा कहा गया था कि नोटबंदी की एक वजह जाली नाेटों पर रोक लगाना भी है, लेकिन यह बात गलत साबित हुई है. नकली नोट के मामले को प्रधानमंत्री मोदी ने हिंसा से जोड़ा था.
उन्होंने कहा था कि आतंकवादियों और आतंकवाद से निपटने के लिए नोटबंदी की गयी थी. यह ऐसा वादा था, जिसे प्रधानमंत्री मोदी को नहीं करना चाहिए था, क्याेंकि भारत में आतंकवाद के कारणों का इससे कुछ खास लेना-देना दिखाई नहीं दिया है. नोटबंदी सर्दी के महीने में हुई थी और उन दिनों कश्मीर में सेना के खिलाफ हिंसा की वारदात कम होती है. लेकिन, कश्मीर में जैसे ही बर्फ पिघलने लगी, हर वर्ष की तरह ही इस बार भी वहां हिंसा की घटनाओं में वृद्धि होने लगी है और यह कारण इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि इसे लेकर जो दावा किया गया था, वह सच नहीं है.
हाल के दिनों में कश्मीर में एक मेजर समेत चार जवान मारे गये हैं. नोटबंदी के कारण यहां आतंकवाद में किसी प्रकार की कमी नहीं आयी है. सेना के लिए ऐसी घटना आश्चर्यचकित कर देनेवाली है, क्योंकि उनसे कहा गया था कि नोटबंदी से कश्मीर में उनके खिलाफ होनेवाली हिंसा पर रोक लग जायेगी.
स्थानीय नागरिकों पर आरोप लगाते हुए सेना प्रमुख ने गुस्से में बयान दिया है कि स्थानीय नागरिक सेना के काम में रुकावट डालने के साथ ही आतंकवादियों को भगाने में सहयोग भी कर रहे हैं. इससे भी ज्यादा चिंताजनक सेना प्रमुख का वह वादा है, जिसमें उन्होंने कहा है कि जो भारतीय पाकिस्तान और इसलामिक स्टेट के झंडे को लहरायेगा, उसे देशद्रोही माना जायेगा और उसके साथ सेना के जवान कड़ाई से पेश आयेंगे.
अगर सेना प्रमुख और उनके सैनिक इस तरह के अपराध में किसी को भी लिप्त पाते हैं, तो उन्हें इसके बारे में उन्हें जम्मू-कश्मीर पुलिस को खबर करनी चाहिए. क्योंकि, सेना के पास झंडा लहराने और नारे लगानेवालों के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है.
सेना प्रमुख जनरल रावत ने अपने इस बयान के दौरान कश्मीर की जनता द्वारा सेना के साथ किये गये व्यवहार के बारे में भी कुछ ऐसी बातें कहीं, जिसे बहुत से भारतीय नहीं जानते होंगे. उन्होंने कहा कि जब सेना आतंकवादियों के खिलाफ कोई कार्रवाई कर रही होती है, तो स्थानीय लोग सुरक्षा बलों की इस कार्रवाई में उनका साथ नहीं देते हैं. यह बात केंद्र सरकार, जिसकी राज्य सरकार में भागीदारी भी है, को एक चेतावनी की तरह लेनी चाहिए. यह बात और है कि कश्मीर में सीमा पार से भेजे जानेवाले आतंकवादी आतंक मचा रहे हैं और यही बात विश्वास करने योग्य भी है. जबकि, यह स्वीकारोक्ति की कश्मीर की पूरी जनता ही सेना के विरुद्ध है, एक अलग बात है.
यह बात सही है या गलत, लेकिन इस बात को जनरल रावत ने स्वीकार किया है कि हमारा उद्देश्य ऐसी कार्रवाई करना होता है, जिससे लोगों को नुकसान न पहुंचे (पीपुल-फ्रेंडली ऑपरेशंस), लेकिन स्थानीय लोग न सिर्फ हमारी कार्रवाई में बाधा पहुंचाते हैं, बल्कि आतंकवादियों को भगाने में भी मदद करते हैं. यही वह कारण है, जिससे बड़ी संख्या में हमारे सैनिक हताहत होते हैं.
भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी जनरल रावत के इस बयान पर आपस में भिड़ रही हैं. जैसा हमने पिछले 30 वर्षों में देखा है, उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस मुद्दे पर इन दोनों ही पार्टियों में कोई खास अंतर नहीं है. कश्मीर में अभी हाल में हुई घटनाएं भी उसी प्रकार की हैं, क्योंकि दिल्ली और पूरे भारत की सोच में कोई बदलाव नहीं आ रहा है.
इसी सप्ताह एक कश्मीरी विद्यार्थी को आतंकवाद के आरोप से तब बरी किया गया, जब यह पता चला कि तकरीबन बारह साल पहले दिल्ली में हुए बम विस्फोट के दिन वह श्रीनगर के एक काॅलेज में था. उस कॉलेज की उपस्थिति पंजिका में उसकी उपस्थिति दर्ज थी और इसलिए पहली नजर में उसे दोषी नहीं माना गया, लेकिन उसका मानना है कि उसे कश्मीरी होने की वजह से बलि का बकरा बनाया गया था. यह घटना 2005 की थी, जब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार थी, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की नहीं.
भारत अपने नागरिकों पर राष्ट्रीयता को लेकर जितना दबाव बनायेगा, हम कश्मीरियों को खुद से उतना ही दूर करते जायेंगे. हमें यह समझना होगा कि कश्मीर में अस्थिरता की जो स्थिति है, वह नोटबंदी से हल नहीं होनेवाली है.
इसके बहुत गहरे कारण हैं. लेकिन, दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं लगता कि हमारे नये सेना प्रमुख इन कारणों को समझते हैं. उन्होंने आगे यह बात भी कही कि हमारा उद्देश्य इन युवाओं की हत्या करना नहीं, बल्कि इन्हें मुख्यधारा में शामिल करना है. लेकिन, अगर वे इसी तरह से व्यवहार करते रहे, तो हम उनके साथ कड़ाई से पेश आयेंगे.
यहां सवाल यह है कि भारत कश्मीरियों के खिलाफ अब और कौन से कड़े कदम उठा सकता है, जो उसने पहले नहीं उठाया है? हम भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पहले ही पैलेट गन का प्रयोग कर चुके हैं, जिससे सैकड़ों लोग अंधे हो चुके हैं, हम बिना सोचे-समझे उन पर अपराधी होने का मामला दायर कर रहे हैं.
इतना ही नहीं, हम कश्मीर की समूची जनता के साथ अपराधियों जैसा सलूक कर रहे हैं. नोटबंदी के बाद जिस अन्य कामयाबी का दावा किया गया वह कहां है, क्योंकि आतंक को रोकने में तो यह विफल रहा है. हमें इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि हिंसा मुद्रा की समस्या नहीं है और इस मामले के जितने अंदरूनी पहलू हैं, उतने ही बाहरी भी हैं. इन्हीं कारणों के आधार पर इस समस्या के नये समाधान तलाशने चाहिए.
