संविधान की शपथ के मायने

आकार पटेल कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया पदभार ग्रहण करते हुए सभी मंत्री और प्रधानमंत्री इस प्रकार शपथ लेते हैं : ‘मैं ईश्वर की शपथ खाकर कहता हूं कि मैं पूरी सच्चाई और निष्ठा के साथ विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान का पालन करूंगा, देश की अखंडता और एकता को बनाये रखूंगा, सत्यनिष्ठा के […]

आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
पदभार ग्रहण करते हुए सभी मंत्री और प्रधानमंत्री इस प्रकार शपथ लेते हैं : ‘मैं ईश्वर की शपथ खाकर कहता हूं कि मैं पूरी सच्चाई और निष्ठा के साथ विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान का पालन करूंगा, देश की अखंडता और एकता को बनाये रखूंगा, सत्यनिष्ठा के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन करूंगा और संविधान व कानून के तहत आनेवाले नागरिकों के सभी अधिकारों की बिना किसी भय, अनुराग व वैमनस्य के रक्षा करूंगा.’
यह शपथ संविधान की तीसरी अनुसूची से लिया गया है. इस शपथ के अलावा गोपनीयता की शपथ भी ली जाती है कि मंत्री प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर अपने अधीन विचाराधीन मामले या किसी भी मामले की जानकारी को किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों से तब तक साझा नहीं करेंगे, जब तक कि मंत्री के रूप में उनके कर्तव्यों के निर्वहन के लिए ऐसा करना जरूरी न हो.
संविधान के प्रति विश्वास बनाये रखने के अपने वादे को हमारे मंत्री और नेता कितनी गंभीरता से लेते हैं, जिसका जरूरी मतलब कानून का पालन करना है? इस सप्ताह बीबीसी ने एक समाचार प्रकाशित किया है- एक भारतीय मंत्री कहती हैं कि उन्होंने बलात्कार करने के संदेह में पकड़े गये व्यक्तियों को अपने जीवन की भीख मांगने के लिए मजबूर कर दिया और पुलिस को उन्हें प्रताड़ित करने का आदेश दिया.
जल संसाधन मंत्री उमा भारती इस बात का दावा करती हैं कि उन्होंने पुरुष अभियुक्तों को उल्टा लटकाने को कहा था और आरोप लगानेवालों को उन्हें प्रताड़ित होते देखने का अवसर दिया था. उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा तब तक करना चाहिए, जब तक कि वे क्षमा की भीख न मांगने लगें. इस रिपोर्ट के अनुसार, मंत्री ने कहा कि बलात्कारियों को उल्टा लटका कर तब तक पीटना चाहिए, जब तक उनकी चमड़ी न उधड़ जाये. उनके घाव पर तब तक नमक-मिर्च लगाते रहना चाहिए, जब तक उनकी चीख नहीं निकल जाती. माताओं और बहनों को इसे देखना चाहिए, ताकि उन्हें संतोष मिले.
उमा भारती ने जो कुछ भी करने का दावा किया है, वह एक आपराधिक कृत्य है. हमारा कानून और संविधान उन्हें ऐसा करने की इजाजत नहीं देता है, क्याेंकि अपने यहां अपराध से निपटने की प्रक्रिया स्पष्ट है.
इसके लिए पुलिस मामला दर्ज करती है और उसकी पड़ताल करती है, उसके बाद मुकदमा दायर होता है और न्यायपालिका फैसला करती है. लेकिन, भारती ने इस संबंध में जाे कुछ भी किया, वह उस संविधान और कानून का उल्लंघन है, जिसे बनाये रखने की उन्होंने शपथ ली थी.
हम इस उपमहाद्वीप में भीड़ द्वारा बिना किसी सुनवाई के सजा देने की अपेक्षा रखते हैं, जैसा कि हमारे मंत्री कर रहे हैं और उसे बताते हुए गर्व भी महसूस कर रहे हैं कि भारत में कानून का किस तरह पालन किया जाता है, संविधान की शपथ का कितनी गंभीरता से निर्वाह किया जाता है.
दूसरी बात यह है कि इस प्रकार दंड देने की इस गर्वोक्ति का भारत में अपराधियों के खिलाफ होनेवाली कार्रवाई के वास्तविक आंकड़ों से मिलान करना चाहिए. वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के दौरान सामूहिक बलात्कार के सात भुक्तभोगियों द्वारा मामला दर्ज कराने के बावजूद अब तक उन्हें न्याय नहीं मिल सका है. इनमें से एक महिला की मौत भी हो चुकी है और बाकी छह महिलाएं न्याय पाने के लिए अभी भी तंत्र द्वारा सुनवाई होने के लिए संघर्षरत हैं. इन महिलाओं को आरोपित बलात्कारियों द्वारा धमकाया भी गया है और उन्हें उन लोगों का भी कोई समर्थन हासिल नहीं हुआ है, जो लैंगिक हिंसा के खिलाफ उठाये गये कदम का प्रचार कर रहे हैं.
दिल्ली में एक युवती के साथ बलात्कार और उसकी हत्या, जिसे निर्भया मामले के नाम से जाना जाता है, के बाद बड़ा आंदोलन हुआ था. इसके बाद कानूनी प्रक्रिया में बदलाव किया गया और यह सुनिश्चित किया गया कि इस प्रकार के हिंसा के भुक्तभोगियों को त्वरित न्याय दिया जायेगा. मुजफ्फरनगर मामले के आलोक में देखें, तो कहा जा सकता है कि अभी भी जमीनी स्तर पर कोई खास बदलाव नहीं आया है. एक ओर जहां लैंगिक हिंसा और बलात्कारियों को सजा देने के मामले में हम पूरी तरह असफल साबित हुए हैं. वहीं, दूसरी ओर इस तरह के अपराध से निपटने के तरीके के बारे में हमारे नेताओं द्वारा दिये गये अपना बखान करते हुए ऐसे बयान हैं.
उमा भारती द्वारा दिये गये बयान के बारे में असामान्य बात यह है कि उन्हें यह एहसास भी नहीं है कि वे संविधान का उल्लंघन कर रही हैं, क्योंकि वह इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हैं कि वह एकदम सही काम कर रही हैं. और उन जैसे लोगों की दृष्टिकोण से जो बात सही होती है, जरूरी नहीं कि वह विधिसम्मत भी हो.
उन्होंने शपथ लिया था कि वे सभी नागरिकाें के साथ सही व्यवहार करेंगी. लेकिन, सच तो यह है कि हमारे समाज में अभियुक्त और अपराधी में कोई भेद नहीं माना जाता है, क्योंकि अब भी यह माना जाता है कि कुछ लोग ‘अच्छे परिवारों’ से आते हैं. जो लोग अच्छे परिवारों से नहीं आते हैं, उन्हें जन्मजात बुरा मान लिया जाता है और हमारा समाज चाहता है कि ऐसे लोगों को सजा मिलनी ही चाहिए.
किसी भी कानून की शिष्ट अवधारणा यही है कि वह अभियुक्त को संरक्षण प्रदान करे और इसी कारण हमारे यहां कहा गया है कि जब तक दोष सिद्ध न हो जाये, तब तक किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता है. लेकिन, यह बात हमारे मंत्री की पुरातन सोच के विरुद्ध है.
असल में इस शपथ के केंद्र में यह हिस्सा है- ‘भारत की एकता और अखंडता.’ यह पवित्र है और जो लोग ऐसी भावना का उल्लंघन करेंगे, यहां तक कि शब्दों के माध्यम से भी, उन्हें मारा-पीटा जायेगा, और वह भी बिना किसी मुकदमे के. जो बचा हुआ हिस्सा है विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति निष्ठा और समर्पण का, वह तो बस संयोग भर ही है.

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