एशिया, अफ्रीका व प्रशांत महासागर के द्वीपों में खेती पर निर्भर लोगों की संख्या में भारी वृद्धि वैश्विक विकास की क्षेत्रीय विषमता का महत्वपूर्ण सूचक है. वल्र्ड वॉच इंस्टीट्यूट के अध्ययन के अनुसार 1980 और 2011 के बीच भारत के कृषि-आश्रित जनसंख्या में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जो किसी अन्य देश की तुलना में बहुत अधिक है.
इस दौरान चीन में यह बढ़त 33 प्रतिशत रही, जबकि यूरोप, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका एवं कैरेबियाई देशों में खेती से जीविका चलानेवाले लोगों की संख्या में कमी आयी है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत, चीन व अफ्रीका में इस वृद्धि का प्रमुख कारण जनसंख्या में वृद्धि है और जिन देशों में यह संख्या घटी है, उसका कारण लोगों का शहरों की ओर रुख करना और कृषि तकनीक व अर्थव्यवस्था का सुदृढ़ीकरण है. इस रिपोर्ट को अन्य अध्ययनों के साथ मिला कर देखें, तो बड़ी चिंताजनक तसवीर उभरती है.
एक ओर खेती पर लोगों का भार बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर पैदावार और कुल घरेलू उत्पादन में खेती का योगदान लगातार कम हो रहा है. गौरतलब है कि खेती पर आश्रित हर व्यक्ति किसान नहीं है. इसमें मछली पालन, शिकार व वन उद्योग से जुड़े लोग भी शामिल हैं. खेती से सीधे जुड़े लोगों में लगभग आधे मजदूर हैं. आर्थिक विकास बढ़ती जनसंख्या के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने में नाकाम रहा है. इसका दबाव खेती पर पड़ा है, जिसकी उत्पादकता और आर्थिकी को बेहतर करने की कोशिशें न के बराबर हुई हैं.
उधर शहरीकरण व औद्योगिकीकरण के दबाव में खेती की जमीन कम हो रही है. दूसरी ओर, खेती पर कॉरपोरेट सेक्टर का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है. किसानों की आत्महत्या की खबरें अब भी आ रही हैं. खेती पर बढ़ते भार को मौजूदा कृषि संकट और असफल आर्थिक नीतियों के आलोक में देखना होगा. कृषि का संकट वास्तव में देश का संकट है. इसका उपाय यह है कि खेती को फायदे का उद्यम बनाया जाये और इस फायदे का बड़ा हिस्सा किसानों व मजदूरों तक पहुंचाया जाये. कभी-कभार पैकेज या फुटकर कर्जमाफी देने की जगह कृषि-संबंधी आर्थिक नीतियों में बदलाव जरूरी है. खेती की कीमत पर किसी अन्य क्षेत्र को बढ़ावा देना विनाश को आमंत्रित करना होगा.
