इससे बड़े दुख, शर्म और नाकामी मेरे झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री और सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान रिम्स के लिए क्या हो सकती है कि कोई पिता अपने दस वर्ष के गंभीर बीमार बेटे को, जिसे वह गांव छोड़कर मेहनत-मजदूरी करते हुए सिमडेगा के सरकारी विद्यालय में पढ़ा रहा हो, और सिमडेगा के सदर अस्पताल से भागते हुए रिम्स में एडमिट कराये और यहां उसे कह दिया जाये कि सांस की बीमारी का इलाज नहीं होगा. वह बदहवासी में निजी अस्पताल को भागता है
और वहां पर इलाज शुरू करने के पहले 15 हजार रुपये की मांग सुनते ही फिर सिमडेगा लौट जाता है और वहां के सदर अस्पताल में अपने बेटे को मरता हुआ देखता है. इस ताजा घटना की खबर दो दिनों तक छपी, परंतु बैंक डिटेल्स नहीं छपा. शायद रांची के लोग मिलजुल कर जिंदगी को बचा ही लेते. उम्मीद है कि आगे से अखबार पूरे विवरण के साथ ही खबर देंगे जिससे समय रहते बचाया जा सके.
पारस नाथ सिन्हा, रांची.
