शुक्र कहिए कि पनडुब्बी सिंधुरत्न सिर्फ हादसे का शिकार हुई, पनडुब्बी सिंधुरक्षक की तरह पूर्णत: तबाह नहीं हुई. और, इस बात का शोक मनाइए कि महाशक्ति कहलानेवाले देशों की पांत में खड़े होने की चाहत रखनेवाला भारत दुश्मन के दांत खट्टे किये बिना अपने बेहतरीन नौसैनिकों को गंवा रहा है.
पनडुब्बी सिंधुरक्षक तबाह हुई थी तो तीन अफसर समेत 18 नौसैनिकों की जान गयी थी और इस बार दो अफसरों की मौत तथा विषाक्त गैस से सात नौसैनिकों के बेहोश होने की खबर है. नौसेना प्रमुख के इस्तीफा देने और हादसे की नैतिक जिम्मेवारी लेने से न तो जान गंवानेवाले नौसैनिकों के परिजनों के दु:ख कम होनेवाले हैं और न ही उनका इस्तीफा इस तथ्य पर परदा डाल सकता है कि रूस में बनी यह पनडुब्बी 40 साल पुरानी थी, भले ही उसका अपग्रेडेशन किया गया हो.
सीमा सुरक्षा के मामले में यह हैरतअंगेज लापरवाही का ही साक्ष्य है कि एक तरफ तो देश सूचना-क्रांति के क्षेत्र में अग्रणी बन कर अपनी श्रमशक्ति की काबिलीयत का दुनियाभर में लोहा मनवा रहा है, दूसरी तरफ रक्षा मामलों में 40 साल पीछे चल रहा है. बात सिर्फ सिंधुरक्षक या सिंधुरत्न की नहीं, नौसेना और वायुसेना के जंगी बेड़े के साथ होनेवाले हादसे के एक पूरे सिलसिले की है. बीते सात महीने में तीन और पनडुब्बियां रखरखाव की कमी से हादसे की चपेट में आ चुकी हैं. हादसों का यह सिलसिला मिग-21 युद्धक विमानों के आये दिन दुर्घटनाग्रस्त होने और पायलटों के जान गंवाने की खबरों की याद ताजा करता है. अपग्रेडेशन के बावजूद मिग-21 दुर्घटनाग्रस्त होते रहे. नौसैनिक बेड़े में होनेवाले हादसों ने कई प्रश्न खड़े किये हैं. एक तो यही कि विदेश से सैन्य साजो-सामान की खरीदारी लगातार बढ़ाते जाने के बावजूद क्या हम रक्षा-सौदों पर ऐसा कोई प्रावधान कर पाये हैं कि दुर्घटना की स्थिति में हर्जाने की कुछ जिम्मेवारी उस देश की भी बने जिससे सामान खरीदा गया है? अहम सवाल यह भी है कि मिसाइलों के निर्माण के दम पर गर्वोन्नत होता देश टैंक और जंगी जहाज ही नहीं, कायदे के रायफल और बुलेटप्रूफ जैकेट तक खुद के बूते बना पाने में क्यों पिछड़ रहा है? सिधुरत्न हादसा और इसके बाद का घटनाक्रम यह संकेत देने के लिए काफी है कि सेना में बहुत कुछ गड़बड़ है.
