मैं भारत का नागरिक हूं. सौभाग्यवश या दुर्भाग्यवश एक मतदाता भी हूं. मेरी मूर्खता कहें या जागरूकता, मैं वोट भी देना चाहता हूं. मेरी लाचारी कहें या बेचारगी, मुङो भाजपा नामक ‘पार्टी विद ए डिफरेंस’ को वोट देना पड़ेगा. कारण सिर्फ एक व्यक्ति है – नरेंद्र मोदी. अन्यथा पूरी की पूरी पार्टी सड़ी हुई है. भाजपा माइनस मोदी इज इक्वल टू जीरो! मैं समझता हूं कि मेरी तरह लाचार और बेबस करोड़ों लोग हैं इस देश में जो भाजपा को वोट देने के लिए मजबूर हैं. खुद को अन्य दलों से अलग कहनेवाली यह तथाकथित हिंदुत्ववादी पार्टी कांग्रेसी संस्कृति से सराबोर है.
येदियुरप्पा जैसे नेताओं की बात ही छोड़ दें, इसके आम कार्यकर्ता भी यही कहते प्रतीत होते हैं कि हम किसी से कम नहीं. इनके और अन्य दलों के कार्यकर्ताओं में कोई अंतर नहीं. चोर, लंपट, बेईमान सब भरे पड़े हैं इस पार्टी में. आप किसी दल से हों, आपका कोई सिद्धांत हो या नहीं, आपका स्वागत है. घोटालेबाज नौकरशाह हों या नेता या व्यापारी, सबका तहेदिल से स्वागत करती है यह पार्टी. अब गिरगिट की तरह रंग बदलनेवाले रामविलास पासवानजी भी इसी दल के साथ फेरे लेने वाले हैं. कुरसी पानी है भाई, सिद्धांत जाये चूल्हे में! वैसे भी सिद्धांत को तो उसी दिन तिलांजलि दे दी गयी थी जिस दिन जनसंघ को भंग कर भारतीय जनता पार्टी बनी थी.
इस देश में जनता को मूर्ख बनाने की जरूरत नहीं पड़ती. मूर्ख तो बने-बनाये होते हैं. हर राजनेता और राजनीतिक दल मूर्खो के बल पर ही राज करता आया है. लेकिन मैं मूर्ख नहीं हूं. मैं बेबस हूं. मेरे पास भाजपा को वोट देने के अलावा कोई चारा नहीं है. और दूं भी किसे? एक तरफ कुआं है, दूसरी तरफ खाई. कुएं में डूबना कौन चाहेगा? सो मैं भाजपा रूपी खाई में ही गिरना पसंद करूंगा. विनय कुमार सिन्हा, रांची
