पिछले दिनों अखबार में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का बयान पढ़ने को मिला कि वे लंगड़ी सरकार के मुख्यमंत्री हैं. सरकारी तंत्र पर अफसरशाही कुछ इस कदर हावी है कि मंत्रियों तक की बातें अनसुनी हो रही हैं.
विकास नीतियों का बार-बार बखान करनेवाले हेमंत सोरेन उस व्यवस्था से निराश हैं जिसके मुखिया वे खुद हैं. जब खुद मुख्यमंत्री व्यवस्था से परेशान हो, तो आम जनता का हश्र समझा जा सकता है. बालू की ठेकेदारी, टेट पास शिक्षक नियुक्ति में विलंब, हाल ही में ददई दुबे की बरखास्तगी का मुद्दा, जैसे कई ज्वलंत उदाहरण हैं जिससे स्पष्ट है कि वर्तमान सरकार सत्ता और राज्य के विकास के बीच सामंजस्य बैठाने में विफल रही है.
ऐसे में हेमंत सोरेन को केजरीवाल से सीखने की जरूरत है, जिन्होंने अव्यवस्थित सरकार चलाने से अच्छा इस्तीफा देना समझा.
