विद्यार्थी जीवन में मां सरस्वती की पूजा का विशेष महत्व है. 31 जनवरी से गाने जो बजने शुरू हुए उस पर विराम लगा तीन फरवरी को. पूजा करने में कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन इसके तरीके से आपत्ति है. क्या इन पूजा समितियों को पता है कि इसी महीने विभिन्न बोर्ड की 10वीं और 12वीं की परिक्षाएं आरंभ हो रही है. इस महत्वपूर्ण समय में पढ़ाई की चार दिनों की बरबादी मायने रखती है.
गाने इतने अधिक आवाज में बजाये जाते हैं कि पढ़ना मुश्किल हो जाता है. इस पर लगाम जरूरी है. प्रशासन को विद्यार्थी हित में हस्तक्षेप जरूर करना चाहिए. सबसे बुरा तो तब लगता है, जब विसर्जन के समय आइटम सांग और अश्लील भोजपुरी गीतों से गली मुहल्ले गूंज उठते हैं. कहते हुए शर्म आती है कि कुछ लोगों ने मां शारदे की पूजा को अपनी अय्याशियों का जरिया बना लिया है. समाज इन समितियों को पूजा का चंदा ना दे कर तथा इनके पूजा का बहिष्कार कर, इन्हें सबक सीखा सकती है.
तनमय बनर्जी, जमशेदपुर
