राजनीतिक दलों को मिलनेवाले नकद चंदे की अधिकतम सीमा दो हजार रुपये तक करने की वित्त मंत्री की घोषणा सराहनीय कही जायेगी, क्योंकि बरसों से चली आ रही चुप्पी टूटी है और लोकतंत्र के महापर्व चुनावों को भ्रष्टाचार-मुक्त करने के मोर्चे पर थोड़ी ही सही, लेकिन प्रगति होती दिख रही है. अब तक चलन यही रहा है कि बात जब राजनीतिक दलों के चंदे की आती है, तो सभी चुप्पी साध लेते हैं, चाहे संसद में विपक्ष की बेंच पर बैठनेवाले दल हों या फिर वे, जिन्हें देश ने सरकार चलाने का जनादेश दिया है. नोटबंदी के समय में सरकार की तरफ से यह तक कहा गया कि आम आदमी को आमदनी-खर्च का तो हिसाब देना होगा, लेकिन राजनीतिक दलों को नहीं, क्योंकि यह कानूनन जायज है.
बीते साल नोटबंदी के महीने में जब बहस इस बात पर छिड़ी कि अगर आम आदमी हजार-पांच सौ के नोट बैंकों में निर्धारित तिथि तक नियत मात्रा में ही जमा कर सकता है, तो इससे राजनीतिक दलों को छूट क्यों दी जा रही है? इस पर राजस्व सचिव हंसमुख अधिया का जवाब था कि अगर कोई रकम किसी राजनीतिक दल के खाते में जमा हो रही है, तो उन्हें ऐसा करने की छूट हासिल है, मगर कोई रकम किसी आदमी के निजी खाते में जमा हो रही है, तो उसकी पूरी पड़ताल की जायेगी. असल दिक्कत यही है कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता बरतने के जो नियम आम जनता पर लागू माने जाते हैं, राजनीतिक दल एक-ना-एक तरीके से उसे मानने से इनकार करते हैं.
नकद चंदे की सीमा 20 हजार से घटा कर दो हजार करने से बेनामी चंदे की समस्या का समाधान तो नहीं होगा, क्योंकि पहले जहां हजार लोगों के हाथों 20 हजार तक का चंदा मिलने की बात पार्टियां कहती आयी थीं, वहां अब 10 हजार लोगों की बात कह कर कानून की मंशा को धता बता सकती हैं. लेकिन, शुभ संकेत माना जायेगा कि राजनीतिक फंडिंग की पारदर्शिता पर बनते जनमत के दबाव में सरकार कुछ करने को विवश हुई. समस्या बड़ी है. एडीआर की रिपोर्ट की मानें, तो राष्ट्रीय पार्टियों की अज्ञात स्रोतों से प्राप्त आमदनी में दस सालों के भीतर 313 फीसद का इजाफा हुआ है. क्षेत्रीय दलों को मिला दें, तो यह वृद्धि 632 फीसद की ठहरती है. समस्या के समाधान के लिए चौतरफा कोशिश करनी होगी.
चुनाव आयोग को ज्यादा अधिकार देने, चुनावी खर्च और चंदे की अधिकतम सीमा तय करने से लेकर हर राजनीतिक चंदे पर आधार-कार्ड अनिवार्य करने जैसे उपाय कारगर साबित हो सकते हैं, जैसा कि पूर्व सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने इशारा किया है. उम्मीद की जानी चाहिए राजनीतिक फंडिंग को पारदर्शी बनाने के प्रयास जारी रहेंगे.
