मैं चिकित्सा विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूं और सामान्य अर्थशास्त्र से इसका दूर -दूर का कोई नाता नहीं. किन्तु जब भी संसद में सामान्य बजट पेश होता है, मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता यह देख कर कि इस देश में अगर किसी ‘शास्त्र’ के सबसे अधिक ज्ञाता हैं, तो वह है अर्थशास्त्र! कोई इसे विकासोन्मुख बतलाता है, तो कोई विकास को अवरुद्ध करने वाला. किसी के अनुसार बजट किसान-विरोधी होता है, तो किसी की नजर में किसान-संरक्षक.
कोई इसे सकारात्मक कहता है, तो कोई नकारात्मक. किसी की नजर में बजट दृष्टिहीन होता है, तो किस की नजर में दूरदर्शी. कोई बजट के कारण निराशा के भंवर में डूब जाता है, तो कोई आशा के समंदर में हिलोरें लेने लगता है. कहने का तात्पर्य यह कि जितने मुंह उतनी बातें. सभी अर्थशास्त्र के ज्ञाता बन जाते हैं. किन्तु मेरी समझ में अर्थशास्त्र का यह अर्थ समझ में नहीं आता कि दो परस्पर विचार सही कैसे हो सकते हैं!
डॉ विनय कुमार सिन्हा, अरगोड़ा, रांची
