इंटरनेट की दुनिया हाल ही में फेसबुक और व्हाट्सऐप के मिलन से गुलजार थी. इसलिए नहीं कि व्हाट्सऐप के फीचर्स लाजवाब थे, बल्कि इसलिए कि इस मोबाइल मेसेजिंग ऐप को अपने पक्ष में करने के लिए इंटरनेट की दुनिया के दो बादशाह, फेसबुक और गूगल उतावले थे. कुछ का मानना है की यह व्यवसाय की विस्तारवादी नीति है. हमें याद रखना चाहिए कि बाजार में इस तरह के क्र य-विक्र य चलते रहते हैं, जो बाजार की तरलता को बनाये रखत हैं.
बाजार रिश्तों की जमापूंजी से नहीं, उपभोक्ता की आवश्यकताओं से चलता है. एक सफल व्यवसायी का गुण है, समय की नजाकत को अपने पाले में करने का और इसी राह पर इंटरनेट जगत में फेसबुक और गूगल चल रहे हैं, तो राजनीति के बाजार में भाजपा और कांग्रेस जैसे खिलाड़ी चल रहे हैं जो छोटे-छोटे क्षेत्रीय दल रूपी ऐप्स को खरीद कर अपने वोटरों को ज्यादा फीचर देने की होड़ में लगे हैं.
व्हाट्सऐप की एक खूबी थी कि संदेश पहुंचते ही वह संदेश सर्वर से मिट जाता था और उसी तरह आज पाला बदलते ही ये नेता सेकुलर से सांप्रदायिक, समाजवादी से पूंजीवादी हो जाते हैं और उनका पूर्व संदेश मिट जाता है. इन ऐप्स की खरीद में कुछ दल फेसबुक की तरह कामयाब हो रहे हैं तो कुछ गूगल की तरह औंधे मुंह भी गिर रहे हैं. भारतीय लोकतंत्र में आजकल इसी नजाकत पर हर दल गिद्ध दृष्टि टिकाये बैठा है.
राजीनीति के पंडित भी काफी सक्रि यता से राजनितिक बाजार की तरलता पर अपनी टिप्पणी देकर आम नागरिकों में राजनीति के प्रति उत्सुकता को बनाये रख रहे हैं. लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही सभी राजनीतिक दलों में बेचैनी बढ़ती जा रही है. खास कर नेहरूवादी सोच से प्रभावित दल अपने कुनबे को समेटने में अपनी ऊर्जा खपा रहे हैं.
संजय कुमार आजाद, रांची
