यूनिसेफ के आंकड़े बताते हैं कि झारखंड में प्रतिदिन पचास नवजात शिशुओं की जन्म के 28 दिनों के अंदर ही मौत हो जाती है. यानी, साल भर में ऐसे लगभग 19000 नवजात शिशु मरते हैं. मौत के मुख्यत: तीन कारण हैं- समय से पहले बच्चे का जन्म, जन्म के समय होनेवाली जटिलाएं एवं संक्रमण. जानकारों का मानना है कि नवजात शिशुओं की मौत को रोकने के लिए मां एवं नवजात शिशुओं की उचित देखभाल, स्तनपान एवं सामाजिक उत्थान को जरिया बनाया जा सकता है. पर अब भी झारखंड में यह सब होता नहीं दिख रहा.
चार दिन पूर्व ही कोल्हान से खबर आयी कि एक नवजात ने ‘ममता वाहन’ में ही दम तोड़ दिया. आज भी ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों पर सुविधाओं का अभाव है. रही-सही कसर वहां नियुक्त चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी पूरी कर देते हैं. इनकी लापरवाही, मनमानी और कई बार अज्ञानता भी काफी खतरनाक साबित होती है. स्वास्थ्य केंद्रों की दशा और वहां नियुक्त स्वास्थ्यकर्मियों का रवैया देख कर आधे से ज्यादा मरीज तो वहां जाने से ही कतराते हैं. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि सुदूर ग्रामीणों इलाकों में स्वास्थ्य के प्रति लोगों में आज भी जागरुकता का भारी अभाव है.
खास कर प्रसव के मामले में तो गांव के लोग अब भी दाई या झोलाछाप डॉक्टरों पर ही ज्यादा भरोसा करते हैं. इसके पीछे वजह शायद यह हो सकती है कि ये आसानी से उपलब्ध होते हैं. यह बात स्वीकार करने में किसी को भी गुरेज नहीं होना चाहिए कि झारखंड में नवजात शिशुओं की मौत को रोकने के लिए अब भी काफी प्रयास किये जाने बाकी हैं.
यह जरूरी है कि लोगों को संस्थागत प्रसव के महत्व से अवगत कराने की दिशा में और काम हो. इसी तरह ममता वाहन के उपयोग की महत्ता के संदेश को भी जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाना आवश्यक है. जब तक सुरक्षित प्रसव के संसाधनों की सुलभता की बात महिलाओं तक नहीं पहुंचेगी, नवजात शिशुओं का मृत्यु दर कम करना मुश्किल है. ग्रामीण क्षेत्रों की अधिकतर महिलाएं रोजी-रोजगार से सीधे जुड़ी रहती हैं. परिवार को पालने-पोसने की जिम्मेदारी भी इन्हीं पर होती है, पर ये खुद पर बहुत कम ध्यान देती हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्य सरकार इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कोई ठोस नीति व कार्यक्रम बनायेगी.
