संपूर्ण विश्व आज हिंदी की महिमा को समझ रहा है. वहीं हम हैं जो उसे कमजोर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे. अंगरेजी भाषा के बढ़ते एकाधिकार ने हिंदी की नींव को हिला दिया है.
आज के माता-पिता बड़े शान से लोगों को यह बताते हैं कि हमारे बच्चों को तो हिंदी बोलना व लिखना ढंग से नहीं आता. हमें ब्रिटेन व अमेरिका से यह भी सीखना चाहिए कि किस तरह उन्होंने अंगरेजी में अपना और विश्व का महान साहित्य अनगिनत तरह से आकर्षक और सुलभ तरीके से लोगों तक पहुंचाया. हिंदी को बचाने का काम सरकार का नहीं, हमारा है. हमारे समाज का है. हम ही उसे अपना खोया हुआ स्वाभिमान फिर से लौटा सकते हैं.
डॉ शिल्पा जैन सुराना, वारंगल, तेलंगाना
