मीडिया के प्रति तानाशाही क्यों?

मीडिया पर सवाल उठाना और पत्रकारों पर हमले होना आज आम बात हो गयी है. इस सुविधापरक राजनीतिक दौर में अगर बात सियासी दलों के पक्ष में न हो तो वो मीडिया को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं. लोकतंत्र के लिए आपातकाल का वह मनहूस दौर भी था जब प्रेस पर पाबंदी लगायी […]

मीडिया पर सवाल उठाना और पत्रकारों पर हमले होना आज आम बात हो गयी है. इस सुविधापरक राजनीतिक दौर में अगर बात सियासी दलों के पक्ष में न हो तो वो मीडिया को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं. लोकतंत्र के लिए आपातकाल का वह मनहूस दौर भी था जब प्रेस पर पाबंदी लगायी गयी थी, अखबारों के दफ्तर की बिजलियां काट दी गयी थीं, अखबार छपने बंद हो गये थे, अगर कोई खबर छपे भी तो वह सरकार के मनमाफिक.

लेकिन एक दौर आज चल रहा है जहां हर बात पर गाहे-बगाहे लोकतंत्र के फलने-फूलने की बात की जाती है, उसके तरक्की करने की बात होती है और ऐसे में सरकार के केंद्रीय गृह मंत्री मीडिया को कुचलने की बात कहें तो यह वाकई हैरान करता है. क्या ऐसे ही होगी तरक्की? क्या इसे ही कहेंगे लोकतंत्र? क्या ऐसे ही आगे बढ़ेगा देश? सरकार के मीडिया से खीझ खाने के पीछे कारण क्या हैं. सबसे पहले इसकी पृष्ठभूमि में जाना होगा. दरअसल पिछले कुछ सालों से देश में हुए बड़े घोटाले मसलन 2जी, कॉनवेल्थ गेम्स, कोयला, आदर्श घोटालों को मीडिया ने पर्दाफाश किया है, इसलिए सरकार मीडिया से खार खाये बैठी है.

वहीं, दूसरी ओर चुनावी समर में जनता के रु झान, जिसे सर्वे के माध्यम से दिखाया जा रहा है वह सरकार को रास नही आ रहा है. इसकी वजह है कि लहर उसके विपरीत चल रही है. अभी पांच राज्यों में हुए चुनाव के नतीजे भी कांग्रेस के भरोसे को डिगा चुके हैं. लेकिन वक्त दूसरों को नसीहत देने के बजाय खुद के गिरेबान में झांकने का है. चुनावी समर में इस तरह की बातों से हमारे नेताओं को बचना चाहिए. मीडिया पर रोष व्यक्त करने के बजाय जनता के उस भरोसे को वापस जीतने की जरूरत है, जिसे सरकार कब की खो चुकी है.

नितेश त्रिपाठी, ई-मेल से

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