राजनीति की तीखी भाषा

हमारे देश में स्वतंत्रता से अपने विचार व्यक्त करने का सबको अधिकार है. प्रत्येक नागरिक को अपने विचार व्यक्त करने की पूरी आजादी संविधान ने दी है, लेकिन कोई नेता सम्मानीय पद पर आसीन शख्सीयत के बारे में अभद्र टिप्पणी करे, तो इससे पूरे समाज को ठेस पहुंचती है. यह भी दुखद है कि राजनीतिक […]

हमारे देश में स्वतंत्रता से अपने विचार व्यक्त करने का सबको अधिकार है. प्रत्येक नागरिक को अपने विचार व्यक्त करने की पूरी आजादी संविधान ने दी है, लेकिन कोई नेता सम्मानीय पद पर आसीन शख्सीयत के बारे में अभद्र टिप्पणी करे, तो इससे पूरे समाज को ठेस पहुंचती है. यह भी दुखद है कि राजनीतिक पार्टियां सार्थक बहस की जगह निजी आरोप-प्रत्यारोप करती हैं.

आज के नेताओं को अपने इतिहास-पुरु षों से सीखना चाहिए कि कैसे वे अपने समकक्ष नेताओं और सम्मानित पदों पर बैठे लोगों को आदर देते थे. राजनीति की भाषा शालीन व भद्र होनी चाहिए, न कि ठेस पहुंचानेवाली. क्या इस बात को हमारे राजनेता समङोंगे? बीते दिनों राजनेताओं के रुख को देख काफी दुख पहुंचा. एक-दूसरे पर आरोप लगाने के बजाय अगर नेतागण जनता के हित के लिए कुछ करें, तो कुर्सी की बात जरूर बनेगी.

अभिषेक कुमार, सेक्टर-2, बोकारो

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