इसे सियासत न समझा जाये

।। चंचल।। (सामाजिक कार्यकर्ता) जनाबेआली यह जो इनसान है न! गजब का मिजाज पाया है इसने. यह चाहे तो देवता बन जाये और न चाहे तो इनसान तो है ही. लेकिन इसके साथ समस्या यह है कि यह बार-बार हैवान बनने की फिराक में रहता है. कम्बख्त जानवरों तक से सीख नहीं लेता. अलसुबह उमर […]

।। चंचल।।

(सामाजिक कार्यकर्ता)

जनाबेआली यह जो इनसान है न! गजब का मिजाज पाया है इसने. यह चाहे तो देवता बन जाये और न चाहे तो इनसान तो है ही. लेकिन इसके साथ समस्या यह है कि यह बार-बार हैवान बनने की फिराक में रहता है. कम्बख्त जानवरों तक से सीख नहीं लेता. अलसुबह उमर दरजी का मुर्गा सबको जगाता है, भला उसे क्या पड़ी है, लेकिन बे-नागा वह अपनी ड्यूटी देता है. टुन्नी का कुकुर बात का पक्का है, हर बखत उसके साथ रहता है, का मजाल कि कोइ हाथ लगा के देख ले. पर इनसान को देखो, अजीबोगरीब हरकत करता रहता है. अभी इसके साथ, अभी उसके साथ. कल तक एक उसूल पर था, आज उसका उसूल बदल गया. तुर्रा यह कि कल तक जिस उसूल को सही मान रहा था, आज उसे खारिज किये हुए खड़ा है और मुस्कुरा कर तसवीर भी खिंचवा रहा है. बच्चू! अगर यही सियासत है तो सियासत का नाम बदल दो, इसे कोइ वाजिब नाम देदो, वरना सियासत जैसी पाक तमीज भदेस हो जायगी और लोग इसे भली नजर से नहीं देखेंगे.

अबे नाटे! खत छोटा कर दे बेटा. हम पुराने जमाने के हैं.. लाल्साहेब नाटे नाई से बाल कटवाते-कटवाते लखन कहार को सियासत समझा रहे हैं. लखन गदोरी में पड़ी खैनी को उंगली से समझा रहे हैं. और यह सारा वाकया लबे-सड़क है. सड़क पर पेड़ की छांव है. सामने आसरे की चाय की दूकान है. दूकान पर अड्डेबाजों का जमावड़ा है, इस जमावड़े में करियवा कुकुर भी है, लेकिन वह चुपचाप जमीन पर कान चिपकाये जमीन के अंदर चल रही हरकतों को सूंघ रहा है. बीच-बीच में मुंह उठा कर भांपता है कि आज कौन-कौन लोग नहीं हैं. उसे कीन उपाधिया से चिढ़ है, क्योंकि जब पिछले साल अलसुबह सोते-सोते अचानक उठ कर कूड़ा और मुंह ऊपर करके हूùùù को लंबा खींचा तो कीन को लगा कि यह उनके रामनामी प्रबचन में खलल डाल रहा है. और उस अहम मसले पर ऐतराज कर रहा है, जहां कीन यह बता रहे थे कि मंदिर कैसे बनेगा. चुनांचे उन्होंने कोलई दुबे का सोंटा खींच कर उस पर दे मारा. वह कुछ दूर भागा जरूर, लेकिन लोगों को सावधान करने के लिए हूùùù की लंबी आवाज देता रहा.

सबसे पहिले इसे चिखुरी ने समझा और अपनी धोती संभालते हुए बाहर भागे- बाहर खुले मैदान में आ जाओ भूचाल आनेवाला है. उमर दरजी ने पूछा था- कइसे मालुम काका? चिखुरी ने बताया था करियवा कुकुर की ओर इशारा करके- उसकी आवाज सुनो और देखो वह आसमान को बता रहा है जमीन डोलनेवाली है, तुम तो शांत रहना. यह होता है कुकुर. और वाकई कुछ ही देर में भूचाल आ गया रहा. यही वजह रही कि वह आज तक कीन उपाधिया को देख कर गुर्राता है.

लाल्साहेब का खत छोटा हो गया. लाल्साहेब की बात खत्म हो गयी, लेकिन कयूम कब चुप रहनेवाले- बेटा लाल्साहेब! आज इनसान और सियासत पर तकरीर कर रहे थे, मगर वह पकड़ में नहीं आयी, बे-सिरपैर लगी बात किस बंदे की हो रही थी. लाल्साहेब उठ कर खड़े हो गये और उस ईंट को पैर से आगे खिसका दिये, जिस पर बैठ कर बाल कटवा रहे थे- कुछ नहीं मियां! कल सुना बिहार वाले रामबिलास राजपूत पाला बदल लिये हैं और उनके साथ हो लिये हैं, जिनके खिलाफ पानी पी पी कर गरियाते रहे हैं.. मद्दू पत्रकार के कान खड़े हो गये- रामबिलास राजपूत! ये कौन है भाई? रामबिलास पासवान तो सुना रहा. लाल्साहेब के कान के पास खुजली हुई, उन्होंने बाल को झटका, आंखे गोल हो गयीं- वही रामबिलास.. तो राजपूत कब से हुए? मद्दू ने जिज्ञासा जाहिर की. लाल्साहेब ने ठहाका लगाया- राजपूत की नयी परिभाषा आयी है, यह वो वाली नहीं है. यह नयी जाति उभरी है राजनीति में चलती है, जिसका मतलब होता है, जिसका राज आते देखो उसके पूत बन जाओ. एक जोर का ठहाका उठा और चौराहा गुलजार हो गया.

चिखुरी मुस्कुराये- गलत देख गया बच्चू. जिसे समझ रहा है वह तो खुद ही हांफने लगा है. उसमें इतना भी दम नहीं कि अकेले चुनाव लड़ ले. बच्चू पासवान अकेले दौड़ लेते, तो कुछ दूर तो निकल सकते थे. लगे तिनटंगी दौड़ दौड़ने. आधी तजि सारी को धावे, आधी बचे न सारी पावै. वह भी बिहार में? जहां कौवे तक राजनीति बोलते हैं. चिखुरी संजीदा हो गये- देखो भाई, अजीब मुहाने पर हम खड़े हैं. जनतंत्र दांव पर लगा है. इसकी कीमत हम नहीं समझ पा रहे हैं, क्योंकि हमें जनतंत्र के लिए, बहुदलीय व्यवस्था के लिए, वोट देने के अधिकार के लिए अलग से कोइ लड़ाई नहीं लड़नी पड़ी है. यह हमें घेलुआ में मिला हुआ है. आजादी के बाद इस मुल्क ने इन तमाम अधिकारों को यूं ही पा लिये हैं. हमें गांधी का शुक्रगुजार होना चाहिए. भला बताइए.. जिन्होंने गांधी की हत्या की, हम उनके साथ चलने की बात करते हैं? बोलते-बोलते चिखुरी कहीं अनंत में खो गये..

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