संस्कृति और आस्था से जुड़े मसलों को लेकर हिंसक होने की प्रवृत्ति हमारे देश का स्थायी भाव बन चुकी है. तमिलनाडु में बीते कुछ दिन से जलीकट्टू पर जारी विवाद इसका ताजा उदाहरण है. हालांकि, राज्य सरकार ने अध्यादेश के जरिये सांड को काबू करने के इस खेल पर लगी अदालती पाबंदी को हटा दिया है, फिर भी विरोध-प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. प्रदर्शनकारी केंद्र सरकार से इस खेल के होते रहने के लिए स्थायी उपायों की मांग कर रहे हैं. सांडों के साथ क्रूर व्यवहार होने के आधार पर अदालत ने जलीकट्टू पर रोक लगायी थी.
अब चूंकि यह रोक हटा ली गयी है, तो प्रदर्शनकारियों को भी अपना आंदोलन वापस ले लेना चाहिए. यदि वे सांस्कृतिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं, तो उन्हें हिंसा से परहेज करना चाहिए और लोकतांत्रिक तरीके अपनाने चाहिए. सरकार और पुलिस को भी संयम और नरमी से काम लेना चाहिए. बहरहाल, तमिलनाडु सरकार के कदम से प्रोत्साहित होकर अब कर्नाटक में भी कंबाला खेल को अनुमति देने की मांग उठ खड़ी हुई है.
इसमें भैंसों की दौड़ होती है. पिछले नवंबर में उच्च न्यायालय ने इस खेल को प्रतिबंधित कर दिया था. ऐसे खेलों के विरोध और समर्थन में खड़े लोगों के तर्क अपनी जगह सही हो सकते हैं, पर पशुओं के साथ क्रूर व्यवहार को रोकने में लगे संगठनों और कार्यकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाने की मांग उचित नहीं है. इसी तरह से राज्य और केंद्र की सरकारों को इस मुद्दे पर भला-बुरा कहना ठीक नहीं है. न्यायिक और प्रशासनिक प्रावधानों तथा परस्पर विचार-विमर्श के माध्यम से ऐसे मामलों का निपटारा किया जा सकता है. हिंसा, अभद्रता और तनाव न सिर्फ अशोभनीय हैं, बल्कि इससे बात उत्तरोत्तर बिगड़ती ही जाती है. हमारे देश में हर मुद्दे का इस्तेमाल कर राजनीतिक रोटी सेंकने का रिवाज भी नया नहीं है.
जलीकट्टू और कंबाला के मसलों पर भी यह हो रहा है. सरकारों, राजनीतिक दलों तथा समाज पर प्रभाव रखनेवाले लोकप्रिय व्यक्तित्वों को अमन-चैन बहाल करने तथा क्रुद्ध लोगों को समझाने-बुझाने का प्रयास करना चाहिए तथा बेमानी पक्षधरता से परहेज करना चाहिए. कुछ जगहों पर प्रशासन के निवेदन पर प्रदर्शनकारियों द्वारा आंदोलन वापस लेना अच्छी खबर है. उम्मीद करनी चाहिए कि जल्दी ही तमिलनाडु में माहौल सामान्य हो जायेगा और कर्नाटक में भड़काऊ तत्वों पर शुरू में ही अंकुश लगा दिया जायेगा.
