प्रभात रंजन
कथाकार
दिल्ली में हर साल आयोजित होनेवाला अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला इस सप्ताह शुरू हो रहा है. मेरे जैसे बहुत से लेखक पाठक अब किंडल या मोबाइल फोन का इस्तेमाल किताब पढ़ने के लिए करने लगे हैं. अभी कुछ समय पहले ही इ-बुक की दुनिया में एक बड़ी घटना यह हुई कि अमेजन किंडल ने हिंदी सहित पांच भारतीय भाषाओं की पुस्तकों की बिक्री अपने यहां शुरू कर दी है. यानी जिनके पास किंडल का इ-बुक रीडर है या जिनके कंप्यूटर या फोन में किंडल का एप है, वे शुल्क चुका कर हिंदी में भी किताबें खरीद सकते हैं. कहने का मतलब यह है कि हिंदी में पुस्तक पढ़ने के वैकल्पिक माध्यम सुलभ होते जा रहे हैं, लेकिन कहनेवाले कहते हैं कि किताबों का अपना सुख है, उनको पढ़ने का अपना आनंद है.
किताब को हम जब चाहे, जहां से चाहे पढ़ सकते हैं, अपनी प्रिय पंक्तियों को अंडरलाइन कर सकते हैं, अपने कमरे में सजा कर रख सकते हैं. उनके ऊपर फख्र कर सकते हैं. जौन एलिया का शेर याद आता है- मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुझे/ मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं. हिंदी के एक मूर्धन्य आलोचक का घर मुझे याद आता है. घर का दरवाजा खुलते ही हर तरफ किताबें ही किताबें. क्या तकनीक के माध्यम से किताबों की भौतिक दुनिया से मुक्ति संभव है? हाल-फिलहाल में तो नहीं लगती. अमेरिका जैसे देश में ही जहां से इ-बुक का चलन शुरू हुआ था अब नये आंकड़े यह आ रहे हैं कि वहां किताबों की बिक्री फिर से इ-बुक से अधिक होने लगी है. हिंदी में तो इसलिए भी किताबों की दुनिया का विस्तार होता जायेगा, क्योंकि हिंदी पट्टी में साक्षरता अभी बढ़ रही है, बुक कल्चर अभी शुरू हो रहा है.
किताब कोई उत्पाद भर नहीं होता. हालांकि, बाजार लगातार यह कोशिश करता है कि उसको प्रोडक्ट के रूप में बेचे. किताबों के साथ हमारी यादें जुड़ी होती हैं, हमारे जीवन के अलग-अलग पड़ावों की स्मृतियां उनमें दर्ज होती हैं. मेरे पास अभी भी वह किताब है, जो मैंने अपने पैसे से सबसे पहले खरीदी थी. अपने बुक शेल्फ में दुष्यंत कुमार का गजल संग्रह ‘साए में धूप’ पर आज भी जब कभी-कभार नजर पड़ जाती है, तो 30 साल पहले का वह दौर, वह कस्बा सीतामढ़ी, वह मिश्रा पुस्तक भंडार जीवंत हो उठता है. इन तीस सालों में मैं जीवन के कितने पड़ावों को पार कर गया, लेकिन ‘साए में धूप’ की वह प्रति देखते ही ऐसा लगता है, जैसे समय ठहर गया हो. पहली किताब खरीदने का वह रोमांच कभी नहीं भूलता.
इसी तरह कभी कोई पुरानी किताब पलटने लगता हूं और उसमें अंडरलाइन की गयी किसी पंक्ति को देख कर वह दौर, वह मनःस्थिति याद आ जाती है. किताबें हमारी स्मृतियों का संचित कोष होती हैं, सिर्फ लेखक के लिए नहीं पाठकों के लिए भी. इसीलिए हम किताबों को संजो कर रखते हैं अखबार की तरह हर महीने रद्दीवाले को नहीं बेच देते हैं.
शायद यही कारण है कि पुस्तक मेलों को लेकर हर साल उत्साह बढ़ता जा रहा है, हर बार मेले में देखता हूं कि लोग पहले से अधिक आने लगे हैं. पहले गिने-चुने शहरों में किताबों के मेले आयोजित होते थे अब ऐसे गिने-चुने शहर बच गये हैं हिंदी पट्टी में, जहां पुस्तक मेलों का आयोजन न होता हो. यह भी अजीब विरोधाभास है कि एक तरफ तकनीकें किताबों के भौतिक अस्तित्व को मिटा देने के लिए लगातार काम कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ किताबों का प्रकाशन, उनकी बिक्री पहले से कहीं अधिक होती जा रही है. आज भी घर में जरूरी वस्तु के रूप में किताबों का अस्तित्व बचा हुआ है. यह बड़ी बात है.
