वैसे तो राजनीति में हर समय कुछ दिलचस्प प्रकरण घटित होता रहता है और उनके इर्द-गिर्द चर्चाओं और बहसों का माहौल गर्म रहता है. लेकिन पिछले कुछ दिनों से देश के मध्य में उत्तर प्रदेश, दक्षिण में तमिलनाडु और पूर्वोत्तर में अरुणाचल प्रदेश की राजनीति में जो हो रहा है, वह हमारे लोकतंत्र की दशा और दिशा के बारे में चिंताजनक संकेत है.
उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी, तमिलनाडु में सत्तारूढ़ अन्ना द्रमुक तथा अरुणाचल प्रदेश में 30 दिसंबर तक सत्तारूढ़ पीपुल्स पार्टी की आतंरिक हलचलें सुर्खियों में हैं. पीपुल्स पार्टी ने अपनी पार्टी के ही मुख्यमंत्री पेमा खांडू को बाहर कर दिया, तो वे 33 विधायकों के साथ भाजपा में चले गये. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी उनकी ही पार्टी से निकाला गया और फिर वापस लिया गया. अब उन्होंने पार्टी के दूसरे गुट को धकिया कर पार्टी की अध्यक्षता पर कब्जा जमा लिया है.
तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक ने दिवंगत नेता जयललिता की सबसे करीबी साथी शशिकला नटराजन को पार्टी की कमान दे दी है. कहा जा सकता है कि यह सब पार्टियों के आतंरिक मामले हैं और जो कुछ हो रहा है, वह संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है. लेकिन क्या इन आधारों पर ऐसे घटनाक्रमों के व्यापक लोकतांत्रिक परिदृश्य में महत्त्व को नकारा जा सकता है?
क्या सपा और राज्य सरकार की उथल-पुथल का मामला महज मुलायम परिवार के अंदरुनी तनातनी का नतीजा कह कर खारिज किया जा सकता है? क्या कभी किसी पद या जिम्मेवारी को निभाये शशिकला के अन्ना द्रमुक के महासचिव बनाये जाने को पार्टी और उसके सदस्यों की इच्छा कह कर टाला जा सकता है? ‘आया राम, गया राम’ के पुराने सियासी मुहावरे को नया मतलब देते हुए कांग्रेस से पीपुल्स पार्टी और अब भाजपा में सामूहिक रूप से विधायकों का जाना आम राजनीतिक प्रकरण कह दरकिनार किया जा सकता है?
लोकतंत्र सिर्फ नियमों और संख्या के आधार पर नहीं चलता, उसकी कुछ विशिष्ट मर्यादाएं भी होती हैं. सत्तर सालों के लोकतांत्रिक अनुभव का निचोड़ परिवारवाद, दावं-पेच, जोड़-तोड़ और व्यक्ति-पूजा तो नहीं होना चाहिए था! बहरहाल, जनता की नजर भी इन प्रकरणों पर जमी हुई है.
