पुष्पेश पंत
वरिष्ठ स्तंभकार
सीरिया में अलेप्पो को आइएस के कब्जे से छुड़ाये जाने के बाद यह भविष्यवाणियां तेज हो गयी हैं कि यह रक्तरंजित गृह युद्ध निर्णायक दौर में पहुंच चुका है अौर संभवतः निकट भविष्य में युद्ध विराम ही नहीं, शांति की पुनर्स्थापना संभव होगी. यह आशा फिलहाल निराधार है. कुछ ही दिन पहले तुर्की में रूस के राजदूत की हत्या करनेवाले ने ‘अलेप्पो का बदला’ नारा लगाया था अौर यही बात मुखर की थी कि सीरिया को लेकर पश्चिम एशिया/अरब जगत में कितने गहरे मतभेद हैं अौर राष्ट्र-राज्य व जनसाधारण भावावेश से पीड़ित हैं.
अंतरराष्ट्रीय मीडिया (पश्चिमी मीडिया) यह प्रचार अभियान चला रहा है कि अलेप्पो में मानवाधिकारों का निर्मम उल्लंघन हो रहा है. यह सच है कि अरब जगत में अमेरिका, सऊदी अरब तथा रूस के गंठबंधन से लाखों लोग बेघर हो चुके हैं, बच्चे अनाथ होते जा रहे हैं, स्कूल-अस्पताल मलबे में तब्दील हो चुके हैं, फंसी आबादी खाने-पीने के लिए तरस रही है, पर यह सवाल पूछा जाना जायज है कि क्या यह सिर्फ अलेप्पो में ही हो रहा है? वास्तव में इसके लिए कौन जिम्मेवार है? सीरिया के दूसरे सबसे बड़े शहर अलेप्पो की बदकिस्मती में दुनियाभर के तमाशबीनों की दिलचस्पी अस्वाभाविक नहीं, मगर समस्या सामरिक शक्ति-संघर्ष तक सीमित नहीं, वरन राजनयिक है.
इसे समझने के लिए असद के साथ अमेरिका के पुराने बैर अौर बगदाद, लीबिया, मिस्र की शृंखला में अमेरिका द्वारा प्रायोजित ‘सत्ता परिवर्तन’ के सिद्धांत के प्रतिपादन को ध्यान में रखने की जरूरत है.
बीते डेढ़ दशक से जो सैनिक शक्ति-संघर्ष अमेरिका की रणनीति के तहत अरब जगत में चल रहा है, उस कारण पुराने शत्रु एक नये शत्रु का मुकाबला करने के लिए एकजुट हुए हैं. आइएस की ताकत को देखते हुए अमेरिका को मजबूरन रणक्षेत्र में इन ‘सहयोगियों’ की मौजूदगी स्वीकारनी पड़ी है. अलेप्पो को आइएस के शिकंजे से मुक्त करानेवाले सैनिक दस्तों में असद विरोधी सीरियाई बागी, हिजबुलाला के पठाये हथियारबंद मददगार, ईरानी सैनिक टुकड़ियां अौर कुर्द लड़ाके शामिल हैं. सबके निशाने पर आइएस है, परंतु यह सुझाना गलत होगा कि रणसंचालन सर्वसहमति से हो रहा है या कि लड़ाई के बारे में किसी तालमेल का प्रयास किया जा रहा है. सभी मौकापरस्त तरीके से अपने तात्कालिक लक्ष्य पाने के लिए लड़ रहे हैं.
इस बात की ही संभावना प्रबल है कि एक बार आइएस को अलेप्पो से खदेड़ने के बाद अापस में मारकाट शुरू हो सकती है. जिस तबके का कब्जा शहर के जिस हिस्से पर होगा, वह उसे अपना विशेषाधिकार क्षेत्र समझ उसी की किलेबंदी में जुट जायेगा, ताकि युद्ध विराम के बाद इसका राजनयिक लाभ उठा सके.
यह कहना तर्कसंगत नहीं कि अलेप्पो को आजाद कराने के बाद सीरिया के गृह युद्ध के समाप्त होने की संभावना बढ़ी है. भारत के लिए यह स्थिति चिंताजनक कही जा सकती है. अरब जगत में हारता आइएस अपने जीवित रहने का प्रमाण देने के लिए दक्षिण एशिया (पाकिस्तान-भारत-बांग्लादेश) की तरफ मुखातिब हो सकता है. या, इस भूभाग से आत्मघाती जेहादी भर्ती करने की कोशिश तेज कर सकता है.
यह आशंका भी निराधार नहीं कि इस्लामी कट्टरपंथ का उन्मूलन करने का संकल्प कर चुके अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ट्रंप का क्या रवैया ईरान अौर लेबनान के प्रति होता है. अमेरिका की मध्य-पूर्व नीति सदा से तेल की राजनीति से जुड़ी रही है. ट्रंप ने जिसको विदेश मंत्री बनाया है, वह तेल उद्योग से जुड़ा है अौर पुतिनकालीन रूस के साथ भी अंतरंग संबंधों का लाभ उठाता रहा है.
यह देखने लायक होगा कि इसका असर रूस के साथ तनाव घटानेवाला होगा या अपने राष्ट्रहित की रक्षा में मुस्तैद नजर आने की विवशता अमेरिका को आनेवाले दिनों में टकराव की तरफ ले जायेगी. ट्रंप ने अपनी परमाण्विक आयुध क्षमता बढ़ाने का इरादा जाहिर किया है, जिससे एक नयी शस्त्र दौड़ आरंभ होने की आशंका है. भले ही यह कहा जा रहा है कि ट्रंप का यह बयान पुतिन के उस बयान के जवाब में था, जिसमें उन्होंने अपने हथियारों के जखीरे को बढ़ाने की बात कही थी. ये बातें उन बदलते शक्ति समीकरणों से अनिवार्यतः जुड़ी हैं, जो अलेप्पो की इस निर्णायक लड़ाई से कहीं अधिक जटिल तत्वों से प्रभावित हो रहे हैं.
अोबामा के शासन काल में विश्व ईराक अौर सीरिया की तबाही का मूक दर्शक बने रहने का आदी हो चुका था.यह पूछना क्रूर लग सकता है पर क्या मासूम बच्चे अौर निहत्थे नागरिक अलेप्पो के बाहर कहीं बड़ी संख्या में नहीं मारे जाते रहे हैं? अलेप्पो का विलाप क्या अमेरिका सिर्फ इसीलिए नहीं अलाप रहा, क्योंकि इस मोर्चे पर उसे इराक या मिस्र की तुलना में सैनिक तथा राजनयिक मात खानी पड़ी है. ट्रंप ने ईरान के साथ अपने पूर्वर्ती द्वारा किये समझौते को भी रद्द करने की चेतावनी दी है. यदि ऐसा हुआ, तो इसका क्या प्रभाव पश्चिम एशिया पर पड़ेगा, यह भी सोचने की जरूरत है.सीरिया के दुर्दिन निकट भविष्य में समाप्त होते नहीं दिखलाई देते. अलेप्पो को मील का पत्थर समझने की जल्दबाजी उचित नहीं.
