वीर विनोद छाबड़ा
व्यंग्यकार
हमें याद है, जब हम टहलते हुए इलेक्ट्रॉनिक के एक नामी शो रूम में घुस जाया करते थे, नये आये आइटम देखने और परखने. उनकी विशेषताओं का विवरण एकत्र करते और और दाम पूछ कर बाहर निकल जाया करते थे. एक दिन हम शोरूम से बाहर निकलने को ही थे कि एक भद्र पुरुष ने हमें रोक लिया. वे उस शोरूम के मालिक थे- टंडन जी.
हम डर गये थे. कहीं चोरी का इल्जाम न लगा दे. लेकिन, टंडन जी ने हमें विधिवत बैठाया और पूछा- आप अक्सर आते हैं, दुकान का कोना-कोना खंगालते हैं. हर छोटे-बड़े आइटम का दाम पूछते हैं और खाली हाथ बाहर चले जाते हैं.
हमने सफाई दी- खरीदने की इच्छा तो बहुत होती है, लेकिन आइटम इतने महंगे होते हैं कि हिम्मत नहीं पड़ती. बजट भी तो होना चाहिए. जिस दिन आमदनी बढ़ेगी, खरीद भी लेंगे.
टंडन जी मुस्कुराये- देखने में आप सज्जन और ठीक-ठाक दिखते हो. आप काम कहां करते हो? सरकारी नौकरी है आपकी?
हम थोड़ा सकपकाये- सरकारी ही समझिये. बिजली विभाग में.
टंडन जी ने बात पूरी नहीं होने दी- उठ कर गले लगा लिया. तो आप बिजलीवाले हो! यार फिर फिक्र काहे की. बस आप आइटम पर हाथ रखो और एड्रेस बताओ. सामान अभी के अभी आपके घर पहुंचता है. ओ श्यामू, जरा चा-शा, ठंडा-शंडा ले आ भाई.
हमने बहुतेरा समझाया- अभी हम संकट में हैं. अगले महीने वेतनमान रिवाइज होने हैं. लेकिन, टंडन जी ने कोई कच्ची गोलियां नहीं खेलीं थी- अरे भाई पैसों की बात मैंने कब की? पैसे तो आते रहेंगे. फिर आप ठहरे बिजलीवाले. जब आपकी इच्छा हो दे देना.
यह तो अच्छा हुआ कि टंडन जी के इनकम टैक्स वाले मित्र आ गये और हमें भाग निकलने का मौका मिल गया. उसके बाद से हम मुद्दत तक टंडन जी के शोरूम के सामने से नहीं गुजरे. अगर कभी मजबूरी में गये भी, तो भूल से भी डिपार्टमेंट का नाम नहीं बताया.
तब कितनी हनक थी अपने बिजली बोर्ड की. लोगों को कितना भरोसा होता था बिजली विभाग और उसके कर्मियों पर और उनकी आमदनी पर. चलती-फिरती कैश-लेस थे. बिना पेमेंट किये जितना माल चाहो उठा लो. मगर हर घूरे के दिन बदलते हैं. बिजलीवालों के भी बदले- बद से बदतर हुए.
एक तो बिजली नहीं दोगे और ऊपर से सूखी रंगबाजी. कौन कब तक बर्दाश्त करेगा? एक दिन किसी ने पीट दिया. सब खतम. शोहरत और इज्जत सभी कुछ. बिजली विभाग का नाम लिया नहीं कि पड़ने लगी गालियां- अरे ये लोग तो बाप को भी बिना घूस लिये कनेक्शन नहीं देते. इएमआइ पर सामान देनेवालों ने भी खदेड़ दिया. बत्ती गुल होने पर अपने भी लथाड़ने लगे.
ऐसे खराब माहौल का शुरुआती दौर था वह. हम एक दिन अपने मेहमानों को लेकर सिनेमा देखने गये. बाहर हाऊसफुल का बोर्ड टंगा था. हम मैनेजर के कमरे में बिना आज्ञा के घुस गये. बिजली बोर्ड से हूं. चार टिकट चाहिए. मैनेजर ने एक क्षण के लिए हमें घूरा और फिर एकाएक गुस्से से फट फड़े. क्या कर लोगे? बत्ती कटवा दोगे! जाओ, कटवा दो. हमने जापान का जनरेटर लगवा लिया है.
मेहमानों के सामने हमारी फजीहत हो गयी. इज्जत बचाने के लिए हमें दोगुने दाम पर ब्लैक में टिकट खरीदना पड़ा था. उस दिन अपनी कुटिया लौटते ही हमने पहला काम यह किया था कि बिजली बोर्ड वाली नेमप्लेट हटा दी. लेकिन, जाननेवालों को कौन समझाये. कोई द्वार पर थूक गया, तो कोई कुत्ता टहलाऊ अपने डॉगी को पोटी कराने लगे.
