डिजिटल भुगतान पर जोर के साथ कैशलेस यानी नकदी-विहीन वित्तीय व्यवस्था की ओर बढ़ने की राह में कई अड़चनें हैं. इन अड़चनों को दूर करने और लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार और बैंकों के साथ नीति आयोग भी प्रयत्नशील है. नीति आयोग के तहत गठित मुख्यमंत्रियों के पैनल ने इस संबंध में भुगतान प्रक्रिया को सरल बनाने की मांग की है ताकि लोग सहूलियत के साथ लेन-देन का सकें.
इस महीने की 25 तारीख से ‘अन्सट्रक्चर्ड सप्लीमेंटरी सर्विस डाटा’ (यूएसएसडी) का बेहतर रूप लागू करने को कहा गया है जिसे आधार संख्या के जरिये भुगतान के एकीकृत इंटरफेस के साथ जोड़ा जाना है. इस तरीके से बिना किसी डेबिट या क्रेडिट कार्ड, पासवर्ड और पिन संख्या के भुगतान करना संभव हो सकेगा. उम्मीद है कि इस प्रयास से उन इलाकों, खासकर ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों, में डिजिटल लेन-देन बढ़ेगा जहां स्मार्ट फोन और इंटरनेट की पहुंच या सेवा का स्तर बहुत अच्छा नहीं है. भारत में नकदी और सकल घरेलू उत्पादन का अनुपात 12 फीसदी है जबकि ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में यह क्रमशः 3.9 और 3.7 फीसदी ही है.
पिछले साल हमारे देश में कुल उपभोक्ता भुगतान का 78 फीसदी नकदी में हुआ था, जबकि विकसित देशों में यह 20 से 25 फीसदी ही है. आठ दिसंबर को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने डिजिटल भुगतान पर कई रियायतों की घोषणा की थी और राज्य सरकारें भी लोगों को जागरूक करने तथा कैशलेस से जुड़ने के लिए कार्यक्रम चला रही हैं. परंतु, इसे हर व्यक्ति के लिए आसान बनाने के उपाय करने के प्रयासों को तेज करने की जरूरत है.
वित्तीय संस्था मेकिंजी का आकलन है कि 2025 तक डिजिटल वित्त 700 अरब डॉलर तक योगदान दे सकता है. यह आकलन नोटबंदी और कैशलेस पर जोर दिये जाने से पहले का है. यदि आबादी के बड़े हिस्से को इस तंत्र में जोड़ लिया गया और नोटबंदी की समस्याओं का समुचित समाधान किया गया, तो डिजिटल लेन-देन के व्यापक लाभ हासिल किये जा सकते हैं. उम्मीद है कि केंद्र सरकार ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों के साथ शहरी क्षेत्रों के निम्न आय वर्ग और छोटे कारोबारियों के लिए सुगम तरीके जल्द उपलब्ध करायेगी.
