रात को बिस्तर पर जाने से पहले उसे देखना ही है कि रसोई में बचा हुआ खाना फ्रिज में रख दिया गया है, दही जमा दी गयी है, थालियों की जूठन समेट दी गयी है, सूखने को डाले कपड़े उतार लिये गये हैं, खाने की कोई चीज उघड़ी तो नहीं है! बारिशों के मौसम में घर में रखे बिस्किट अगर सील जायें, तो उसे बेसहूर की उपाधि मिल सकती है. मैंने मांओं को तो कभी इत्मीनान में नहीं देखा, बल्कि हमेशा व्यग्र और ग्लानि में देखा है.
स्त्री के पास आराम के पल कहां
उसे पुरुष की तरह सोचना चाहिए, भद्र महिला की तरह व्यवहार करना चाहिए, एक युवती सा दिखना चाहिए और एक घोड़े की तरह काम करना चाहिए. पुरानी कहावत है यह भी कि एक पुरुष सूर्योदय से सूर्यास्त तक काम करता है, लेकिन एक स्त्री का काम कभी खत्म नहीं होता. मजेदार है कि उसे गुस्सा […]

उसे पुरुष की तरह सोचना चाहिए, भद्र महिला की तरह व्यवहार करना चाहिए, एक युवती सा दिखना चाहिए और एक घोड़े की तरह काम करना चाहिए. पुरानी कहावत है यह भी कि एक पुरुष सूर्योदय से सूर्यास्त तक काम करता है, लेकिन एक स्त्री का काम कभी खत्म नहीं होता. मजेदार है कि उसे गुस्सा भी आये, तो वह हाथ से ग्लास नहीं फेंकना चाहेगी, इसलिए कि इससे बाद में कांच समेटने और बिखरे पानी पर पोछा लगाने का उसका ही काम बढ़ेगा.
माया एंजेलू की एक कविता ‘अ वूमेंस वर्क इज नेवर डन’ याद आती है. माया बरसात से कहती हैं कि हौले से मुझे छूना. सूरज मुझ पर चमकना. समुद्र, बरसात और पहाड़ ही हैं, जिन्हें मैं अपना कह सकती हूं. आज मुझे सोने देना, बहुत काम पड़ा है. मेरा काम अभी खत्म नहीं हुआ है.
इत्मीनान, मोहलत, फुरसत या जिसे हम ‘लेजर’ कहते हैं, का स्त्री के लिए क्या अर्थ है, यह सोचना दिलचस्प हो सकता है. फुरसत का समय यानी वह समय, जब स्त्री सिर्फ अपने घरेलू कार्यों से आजाद नहीं है, बल्कि जब वह दिमाग से भी मुक्त है अपनी गृहस्थी की भूमिका से. जब वह उस खाली वक्त का इस्तेमाल बेहतर तरीके से अपने लिए कर पा रही है और उस बेहतर तरीके को चुनने के लिए वह सामाजिक-सांस्कृतिक दबावों से पूरी तरह आजाद है. ऐसा फुरसत का समय श्रमजीवी स्त्री के पास तो नहीं ही आता, जिनके लिए आर्थिक संकट भी कोई संकट नहीं हैं. आमतौर पर वे स्त्रियां भी फुरसत के पल किसी-न-किसी तरह घर-परिवार गृहस्थी में अपनी उपयोगिता बढ़ाने के कौशल विकसित करने में ही लगा रही होती हैं, जैसे सास-बहू सीरियल ही देख कर या दोपहर को उन धारावाहिकों को खबर की तरह देख कर खाली वक्त में अचार-पापड़-सिलाई-बुनाई-रफू, मोहल्लागिरी या अगले भोजन के वक्त की तैयारी करते हुए भी वह अपनी दी गयी भूमिका को और
भी पुष्ट कर रही होती हैं. एक स्वतंत्र सोच रखनेवाले व्यक्ति के तौर पर अपना आत्मिक विकास कर पाने के अवसर या उनका दबावमुक्त चयन स्त्री के लिए एक बेहद मुश्किल बात है. कस्बाई स्त्री का जीवन शहरी मध्यवर्गीय स्त्री से इस मायने में बहुत फर्क है. स्त्री का अपने खाली वक्त में अखबार और पत्रिकाएं पढ़ना, अपने प्रिय लेख पर संपादक या स्वयं लेखक को पत्र लिखना, मेल लिखना, फेसबुक या ट्विटर जैसे सोशल साइट्स पर वृहत्तर समाज से जुड़ना सिर्फ चुनाव का नहीं, बल्कि सुविधाओं की उपलब्धता का भी मामला है. यह सामाजिक-सांस्कृतिक दबावों का भी मामला है और सबसे महत्वपूर्ण यह दिमागी कंडीशनिंग का भी मामला है. सब काम निबट जाने के बाद, सबकी सभी जरूरतें पूरी होने के बाद, सबका पेट भर जाने के बाद अपने लिए सोचना, सोना, खाना या ऐसा ही कुछ स्त्रियों को खुद को प्राथमिकता पर रखने से रोकता है.
वर्जीनिया वूल्फ जब अपनी पुस्तक ‘अपना एक कमरा’ में स्त्री के साहित्यकार होने के लिए उसके अपने कमरे और अपनी खुद की स्पेस की वकालत करती हैं, तो उसमें यह निहित होता है कि यह स्पेस और वक्त बाहरी डिमांड्स से मुक्त हो, जोकि अब तक स्त्री के जीवन चक्र में संभव ही न रहा. वुल्फ लिखती हैं- ‘अगर मिसेज सेटन पैसे बना रही होतीं, तो खेलों और झगड़ों से जुड़ी तुम्हारी यादें कैसी होतीं? लेकिन, तुम तब शायद अस्तित्व में आयी ही नहीं होतीं. पैसे बनाना और तेरह बच्चे करना- कोई इनसान इसे नहीं झेल सकता, क्योंकि आम तौर पर पहले नौ महीने और फिर आगे के कम-से-कम पांच छह महीने स्तनपान के, बच्चे के साथ लगे-लगे ही बीतता है और आगे भी बच्चे आवारा होकर सड़कों पर भागते फिरें, यह कोई समाज पसंद नहीं करेगा, सो आनेवाले और कम-से-कम पांच-दस साल इसमें चले जाते हैं. जब आर्थिक संघर्ष भी इसके साथ जुड़ जाते हैं, तो स्थिति और भी अवसादपूर्ण होती है.
रूसी कवि मरीना स्विताएवा अकेली ही तीन बच्चों को पाल रही थीं, जिनमें एक बच्ची लगातार बीमार रहती थी, दूसरी को आर्थिक संकट के चलते अनाथालय भेजना पड़ा, जहां उसकी मृत्यु हो गयी. ऐसे में उसे महीनों कलम को छू भी सकने का समय नहीं मिलता था. लिखने का संकट मरीना का अकेले का संकट था और तमाम जद्दोजहद के बाद आखिर वह आत्महत्या करती है. अपने एक खत में वे लिखती हैं- ‘रातभर बिस्तर पर बैठे रहना होता है. आल्या को 40.4 डिग्री बुखार है, मलेरिया है. जी रही हू. चारों ओर उदासीनता है. मैं और आल्या इस संसार में अकेली हैं. मास्को में कोई भी हमारी तरह अकेला नहीं. दूसरे बच्चों के पास कोई-न-कोई बैठा होता है और मैं उसे अकेली छोड़ने को विवश हूं, क्योंकि जलावन की लकड़ी लाने के लिए बाहर निकलना जरूरी है. पिछले कुछ दिनों से मैं इतनी सुखी थी- आल्या ठीक हो गयी थी. और मैं दो महीनों के बाद फिर से लिखने लगी थी- पहले से कहीं ज्यादा और बेहतर.’
सम्भवत: इसी द्वंद्व से बचने के लिए और अपने जीवन को बचाने के लिए स्त्री एक वृत्ताकार जीवन में चुन ली जाती है, जहां उसे गोल-गोल घूमना है. भले ही वह भी पर्याप्त उकताहट भरा हो, लेकिन अपेक्षाकृत सुरक्षित हो. टॉल्स्टॉय के एक उपन्यास ‘आन्ना कारेनिना’ में जैसे एक स्त्री पात्र चिढ़ कर कहती है कि ‘हर साल या तो मैं गर्भवती होती हूं या छोटे बच्चे को पाल रही होती हूं. लगता है मैं हमेशा से बीमार हूं, इससे दरअसल मैं अंदाजा नहीं लगा पा रही हूं कि एक श्रमिक स्त्री के लिए जीवन में फुरसत और इत्मीनान जैसे शब्द कितने फालतू हो सकते हैं और निराला की कविता ‘वह तोड़ती पत्थर’ उसे किस कदर एक बेमानी कविता लग सकती है.
सुजाता
युवा कवि एवं लेखिका
chokherbali78@gmail.com