अफगानिस्तान की स्थिरता के लिए अमृतसर में चार दिसंबर को आयोजित ‘हार्ट फ एशिया’ सम्मेलन की प्राथमिकता आतंक-विरोधी रणनीति पर सहमति बनाना है. दक्षिण एशिया में आतंक को बढ़ावा देने में पाकिस्तान की भूमिका पर भारत और अफगानिस्तान पहले से ही सवाल उठाते रहते हैं. इसी मसले पर दोनों देशों ने सितंबर में पाकिस्तान में होनेवाली सार्क बैठक का बहिष्कार किया था. ‘हार्ट ऑफ एशिया’ सम्मेलन में 14 देश भाग ले रहे हैं, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, रूस, चीन, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की तथा मध्य एशिया के देश शामिल हैं.
सम्मेलन के सहभागियों के साथ अफगानिस्तान को सहयोग दे रहे अन्य देश भी इस बात पर सहमत हैं कि आतंक से तबाह अफगानिस्तान का पुनर्निर्माण और स्थायित्व एशिया की बेहतरी की जरूरी शर्त है. तालिबान को पाकिस्तानी समर्थन जगजाहिर तथ्य है. पड़ोसी देशों के खिलाफ आतंक के प्रयोग की पाकिस्तानी नीति की भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना होती रहती है. लेकिन, ताकतवर देशों ने पाकिस्तान के रवैये पर लगाम लगाने की ठोस पहल नहीं की है.
रूस द्वारा ग्वादर बंदरगाह के इस्तेमाल पर पाकिस्तान की सहमति और इस बंदरगाह पर चीनी नौसेना की तैनाती जैसे निर्णयों से पाकिस्तान का हौसला ही बढ़ेगा, अगर ये देश उसकी खतरनाक राजनीति की अनदेखी करना जारी रखते हैं. वर्ष 2011 के अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हुए व्यापारिक यातायात समझौते का भी पालन ठीक से नहीं हो रहा है, जिससे भारत और अफगानिस्तान के बीच आयात-निर्यात में मुश्किलें आ रही हैं. दक्षिण एशिया के बड़े बाजारों तक पहुंच के बिना अफगानिस्तान की आर्थिक प्रगति संभव नहीं है.
नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान द्वारा युद्धविराम के लगातार उल्लंघन की आड़ में आतंकियों की घुसपैठ की कोशिशें हो रही हैं. अफगानिस्तान में तालिबान की गतिविधियों के पीछे भी कुख्यात आइएसआइ का हाथ है. पाकिस्तान में रह रहे लाखों अफगानी शरणार्थियों को जबरन वापस भेजने की नीति भी अफगानिस्तान की शांति के लिए किये जा रहे प्रयासों के अनुकूल नहीं है. उम्मीद है कि ‘हार्ट ऑफ एशिया’ की बैठक में पाकिस्तान पर व्यापक दबाव बनाने की कोशिश की जायेगी, ताकि अफगानिस्तान के साथ मध्य और दक्षिण एशिया के विकास का रास्ता निर्बाध हो सके.
