गिरींद्र नाथ झा
ब्लॉगर एवं किसान
हाल ही में गांव में एक लड़के से मुलाकात हुई. उसके हाथ में एक महंगा स्मार्टफोन था. वह दिल्ली में खाना बनाने का काम करता है. संतोष नाम के उस लड़के ने बताया कि इस बार उसने 13 हजार रुपये में मोबाइल खरीदा है. हमने पूछा कि घर में शौचालय है?
संतोष ने तपाक से कहा- ‘नहीं है. यह काम तो सरकार का है न, हम क्यों बनवायें?’ उसकी बातें सुन कर लगा कि हम सरकार पर किस तरह आश्रित होते जा रहे हैं. यह कहानी लाखों घरों की है. संतोष की बातों से पता चलता है कि हम दिखावे के पीछे किस तरह भाग रहे हैं और उन चीजों को नकार रहे हैं, जिसका संबंध हमारे स्वास्थ्य और स्वच्छता से है. चकाचौंध ने हमें वश में कर लिया है और जब कोई सवाल करता है, तो हम सरकार की तरफ उंगली उठा देते हैं.
संयुक्त राष्ट्र की एक रपट के अनुसार, अपने देश में लोग शौचालय से ज्यादा मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं.देश में 54 करोड़ 50 लाख लोग मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं, वही केवल 36 करोड़ 60 लाख लोग शौचालयों का उपयोग करते हैं. यह आंकड़ा पांच साल पुराना है. मेरा मानना है कि इस बीच मोबाइल धारकों की संख्या में बढ़ोतरी ही हुई होगी, लेकिन शौचालय की संख्या उतनी ही होगी. अब बताइये, जरूरत किस चीज की है और हम किस चीज में लगे पड़े हैं. यह सच है कि सरकार शौचालय बनाने के लिए पैसा देती है. ऐसे में सवाल उठता है कि वह पैसा आखिर कहां जा रहा है.
अभी भी ग्रामीण समाज शौचालय को लेकर गंभीर नहीं है. सरकारी आंकड़ों पर लंबी बहस हो सकती है लेकिन ग्राउंड जीरो कुछ और कहता है. गांव-देहात में मोबाइल और महंगी बाइक आपको हर जगह मिल जायेंगे, लेकिन क्या शौचालय दिखते हैं? यह बड़ा सवाल है. युवाओं को इन मुद्दों पर सोचना होगा और पहल करनी होगी. इन दिनों हम स्टार्टअप की बात करते हैं.
हर कोई नया करना चाहता है. ऐसे में शौचालय के निर्माण और इसके प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए क्यों नहीं हम भी कुछ नया करें. अब भी गांव में लोग कहते हैं कि हमारे पास शौचालय बनाने के लिए जगह कहां है. जबकि, हमें मालूम होना चाहिए कि गड्ढे वाले शौचालय का निर्माण मात्र एक मीटर व्यास में भी किया जा सकता है. चूंकि यह जलबंध शौचालय है, अत: इससे बदबू भी नहीं आती है. दरअसल, हमें स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना होगा. हम अपने स्तर पर भी यह काम कर सकते हैं. ऋण लेकर अगर हम मोटरसाइकिल या ट्रैक्टर खरीद सकते हैं, तो फिर शौचालय को क्यों नहीं प्राथमिकता दे सकते?
सरकारी आंकड़ों के इतर हमें अपने स्तर पर भी यह पता लगाना चाहिए कि कितने लोग अपने घरों में शौचालय बनवा चुके हैं.
मोबाइल एप्प बनानेवाली कंपनियों से जुड़े युवाओं को इन विषयों पर सोचना चाहिए कि क्या ऐसा एप्प तैयार किया जा सकता है कि हम यह पता लगा लें कि सरकारी आंकड़ों में जिन घरों में शौचालय की बनने की पुष्टि है, वह सच है यह गलत. ‘गोटा-गो’ एक ऐसा एप्प है, जिसे कुणाल सेठ ने 2010 में बनाया था. खास बात यह है कि यदि आप घर से बाहर हैं और आपको टॉयलेट यूज करना हो, तो यह एप्प आपको आपके आसपास के सभी पब्लिक टॉयलेट्स की जानकारी आपके मोबाइल स्क्रीन पर उपलब्ध करायेगा, वह भी नक्शे के साथ. ऐसे प्रयासों की जरूरत है.
गांव में शौचालय निर्माण को लेकर निजी स्तर पर भी काम करने की जरूरत है. ग्रामीणों को और पंचायत प्रतिनिधियों को स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारे में अच्छी तरह से बताने की जरूरत है.
