क्षमा शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
घर के बाहर चबूतरे के पास बहुत मोटे तने वाला छतनार नीम का पेड़ था. उसकी बहुत सी डालियां घर के आंगन की दीवार फांद कर अंदर की तरफ झुकी आती थीं, जैसे घर के अंदर की खैर-खबर ले रही हों. गांव में आस-पास के लोग अकसर उसके नीचे पड़ी खाट पर बैठते थे. पिता, चाचा तथा ताऊजी के साथ गप-गोष्ठी करते थे. रामचरित मानस की चौपाइयां गाते थे.
कबीर के दोहे सुनाते थे. कहावतें और हंसी-मजाक भी होता था. किसी की बुराई करनी होती, तो अब तक जो आवाजें बहुत तेज सुनाई दे रही थीं, वे फुसफुसाने लगतीं कि कहीं कोई आता-जाता सुन न ले. ऐसी गोष्ठियां घर में आनेवाले किसी अखबार की तरह भी होती थीं. जिनमें गांव भर की खबरें होती थीं. कहां क्या हो रहा है, किस के यहां शादी है, किसकी नौकरी दूर देश में लग गयी, किसके खेत में रात को फलां के पशु घुस गये, किसके घर में दिन-दहाड़े चोर आ गये, आदि बातें होती थीं, यानी अखबार की तरह खबरें घर बैठे मिल जाती थीं.
मच्छर ज्यादा हो जाते, तो नीम के सूखे पीले पत्तों की मांग बढ़ जाती. उसके धुएं से मच्छर मर जाते थे. गरमियों में उसके पत्तों के पानी से बच्चों को नहलाया जाता. किसी को फोड़ा-फुंसी हो जाता, तो नीम की छाल को घिस कर लगाया जाता. किसी को चेचक निकल आता, तो नीम की पत्तियों को कमरे के बाहर लटका दिया जाता. उसकी तांबई कोंपलें मिसरी के साथ और पकी निंबोलियां वैसे ही खाने को दी जातीं. उसके गोंद का भी इस्तेमाल था. यही नहीं, जब उसकी कोई मोटी डाल सूख जाती, तो उससे घर की चौखट और खिड़कियां भी बनवाई जातीं और खुशी मनाई जाती कि ये चौखटें-खिड़कियां तो जनमटार यानी जनम भर के लिए हो गयीं. इनमें कभी घुन नहीं लगेगा. ऐसा लगता था कि नीम के पास घर की हर समस्या का इलाज है.
गरमियों में नीम पर सफेद छोटे सितारों जैसे इतने फूल खिलते कि हरी पत्तियां ढक जातीं. फूलों की मदमाती खुशबू चारों ओर फैल जाती. गिलहरियां खूब उछल-कूद मचातीं. गांव भर के कौवे, गौरैय्या उस पर बसेरा करतीं. कभी-कभार किसी अतिथि की तरह कोई बंदर भी उस पर आ विराजता. कौवे उसके सिर पर चोंच मार-मार कर उसे वहां से चले जाने का संकेत देते.
बिल्लियां उसके नीचे बैठ किसी पक्षी के शिकार का इंतजार करतीं.
जब कभी घर का तोता बहुत कर्कश आवाज में बोलता था, तो मां उसे प्यार से डपटती थी- जरूर तेरा घर नीम की खोखल में रहा होगा. इसीलिए इतना कड़वा बोलता है. नीम के नीचे बैठ कर गाय पगुराती थी और कुत्ता भी उसका हमजोली बन वहीं आराम पाता था.
सावन आता तो न केवल घर के बच्चे, बल्कि पड़ोस के बच्चे बड़ी बेसब्री से नीम पर झूला पड़ने का इंतजार करते और बारी-बारी से झूलते. आपस में प्रतियोगिता करते कि कौन अपने झूले को ज्यादा ऊंची पींग बढ़ा कर ले जायेगा. यों हमारी मां नीम को अपने घर का सबसे बुजुर्ग मानती थी. वह कहती थी कि जब वह ब्याह कर आयी थी, तब भी नीम ऐसे ही खड़ा था, घर के बाहर किसी मुस्तैद चौकीदार की तरह. जब उसके बच्चे ब्याह लायक हुए, तब भी वह वैसे का वैसा ही है.
मां को गुजरे वर्षों हो गये. उसका प्यारा नीम भी अब कहीं नहीं है. उसके निशान भी अब नहीं बचे हैं. परिवार बढ़ा तो नीम की बलि ले ली गयी. वह घर की तीन पीढ़ियों का सखा था, लेकिन उसकी सिसकियां भी किसी को सुनाई नहीं दीं. पेड़ों के दुख को हम कितना कम महसूस करते हैं. उनके मरने-जीने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता!
