मोदी की जापान यात्रा के दौरान जो अनेक समझौते हुए हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण निश्चय ही परमाण्विक ऊर्जा के क्षेत्र में सहकार वाला समझौता है. इसे सामरिक संवेदनशीलता की दृष्टि से ही नहीं, आर्थिक तथा पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में भी उल्लेखनीय समझा जाना चाहिए. जापान पर्यावरण के संरक्षण के बारे में भी काफी सतर्क रहता है. मोदी ने इसीलिए यह तर्क भी पेश किया है कि ‘स्वच्छ’ परमाण्विक ऊर्जा के बारे में आश्वस्त होने पर ही भारत पेरिसवाले पर्यावरण विषयक करार का पालन कर सकता है. यह दलील जापान के लिए काम आसान बनाती है कि वह अपनी पुरानी आपत्तियों को त्याग सके. जापान विश्व का अकेला देश है, जिसने एटमी हथियारों की तबाही झेली है. उसी ने फुकोशिमा जैसी परमाण्विक दुर्घटना का त्रास भी देखा है. अतः उसका समर्थन जुटाना कम बड़ी बात नहीं.
परमाण्विक समझौता महत्वपूर्ण
जापान तथा भारत के बीच परमाण्विक ऊर्जा के क्षेत्र में जो समझौता हुआ है, उसे निःसंदेह महत्वपूर्ण समझा जाना चाहिए. जापान ने काफी हील-हुज्जत के बाद यह बात स्वीकार कर ली है कि परमाण्विक अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किये बिना भी वह भारत के साथ परमाण्विक ऊर्जा तथा शोध विषयक सहकार करेगा. हालांकि, यह शर्त जोड़ी गयी है कि यदि भारत ने भविष्य में परमाण्विक विस्फोट किया, तो इस करार को खारिज किया जा सकता है. इस बात को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि जापान के राजी होने के बाद अन्य देशों के साथ ऐसे समझौतों का मार्ग सहज हो जायेगा. चीन, जो भारत की एनएसजी समूह में सदस्यता के मार्ग में रोड़े अटकाता रहा है, अब कोई दूसरा पेंच तलाशने को बाध्य होगा. उसे क्रमशः अलग-थलग करने की भारतीय कूटनीति सफल होती नजर आ रही है. पिछली बार जब मोदी ने जापान यात्रा की थी, तब उनके आलोचकों ने यह टिप्पणी की थी कि वादे अौर सौदे तो बहुत सारे घोषित हुए पर हाथ क्या लगा, यह बताना कठिन रहा था. छह साल से भारत इस बात के लिए प्रयास कर रहा था कि वह इस मुद्दे पर जापान का विरोध समाप्त कर दे, पर अब तक निराश ही होता रहा है.
इस उपलब्धि को अकेले मोदी या भारत के राजनय का ही चमत्कार नहीं माना जाना चाहिए. दक्षिणी चीनी सागर में चीन के आक्रामक विस्तारवादी रुख ने जापान को यह सोचने पर मजबूर किया है कि यदि वह इस मामले में ना-नुच करता रहेगा, तो भारत के समर्थन की आशा नहीं कर सकता. इसके साथ ही, यह बात रेखांकित करने की जरूरत है कि जो अमेरिकी कंपनियां भारत को परमाण्विक संयंत्र बेच रही हैं- तोशिबा-वैस्टिंग हाउस तथा हिताची-जनरल इलेक्ट्रिक- उनमें जापानी पूंजी निवेश कम नहीं. वह तब तक भारत के साथ सौदे नहीं पटा सकतीं, जब तक उसे परमाण्विक ईंधन बेचने की छूट नहीं मिल जाती. जापान के साथ जो समझौता हुआ है, वह वैसा ही ‘अपवाद’ समझा जा सकता है, जैसा अमेरिका तथा रूस के साथ किये समझौते हैं. इस सूची में मैक्सिको, दक्षिण कोरिया, अॉस्ट्रेलिया तथा कनाडा को जोड़ा जा सकता है.
मोदी ने जापान की सहमति हासिल करने के लिए जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे को भारत के साथ लाभप्रद व्यापार की अन्य सहूलियतें-रियायतें भी निश्चय ही सुझायी होंगी. टोक्यो से कोबे तक की यात्रा उन्होंने उस बुलेट ट्रेन से की, जिस तरह की रेलगाडी अहमदाबाद से मुंबई तक चलाने की महत्वाकांक्षी परियोजना का एेलान वह कर चुके हैं. लाखों करोड़ रुपये की लागत वाला यह सौदा अब तक चीन के खाते में जाता नजर आ रहा था. इस क्षेत्र में जापान ही चीन का प्रमुख प्रतिद्वंद्वी है. इंडोनेशिया में चीन ने जापान से बाजी मारी है, पर चीन तथा भारत के बीच बढ़ते मनोमालिन्य के मद्देनजर यह संभव है कि जापान वाला विकल्प भारत को बेहतर लगने लगा हो. वैसे भी भारत के संरचनात्मक ढांचे में सुधार वाले अभियान में जापान का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. मुंबई-दिल्ली गलियारा अौर मेट्रो परियोजना इसके दो चुनिंदा उदाहरण हैं.
जापान इस बात से सुपरिचित है कि अमेरिका अौर चीन की तुलना में बहुत छोटी होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था संसार की तीसरी सबसे बड़ी एवं उदीयमान अर्थव्यवस्था है. न तो इस बाजार की उपेक्षा जापान कर सकता है न यहां के विशाल कुशल श्रम भंडार की. सुजुकी, होंडा जैसी कंपनियां आज भी दुनिया के अनेक देशों के लिए उत्पादन भारत में लगे अपने संयंत्रों से करती हैं. रेनबैक्सी जैसी भारतीय फार्मा कंपनी को भी एक जापानी कंपनी ने ही खरीद कर यह संकेत दिया था कि भारत को जापानी निवेशक एक आकर्षक लक्ष्य समझते हैं.
व्यापार को बढ़ाने की गुंजाइश
यहां यह याद दिलाने की जरूरत है कि अभी तक भारत अौर जापान के बीच व्यापार का आकार बहुत छोटा है. जापान का हिस्सा भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का कुल 2.5 प्रतिशत है अौर जापान के व्यापार में भारत का हिस्सा इसका लगभग आधा है. इस व्यापार को बढ़ाने की काफी गुंजाइश है. यहां यह जोड़ना जरूरी है कि ‘पूरब की तरफ देखते रहने की जगह उस दिशा में कुछ करने की’ मोदी की नीति ही इस मंसूबे को पूरा नहीं कर रही, बदले भू-राजनीतिक समीकरण अौर भू-आर्थिकी के दबाव दोनों देशों को गतिशील बना रहे हैं. इसी कारण पाकिस्तान से निर्यात किये जानेवाले आतंकवाद के बारे में भी भारत को जापान से बेहिचक समर्थन मिल सका है.
तेजी से बदलते अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भारत अौर जापान दोनों को ही एक-दूसरे की उपयोगिता महसूस हो, यह स्वाभाविक है. ट्रंप के राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने ने भारत को इस बाबत सोचने के लिए मजबूर किया है कि अमेरिका निकट भविष्य में भारतीय श्रम तथा उत्पाद के आयात को बुरी तरह बाधित कर सकता है. यदि गुणवत्ता के बारे में हमारे उत्पाद तथा सेवाएं वैश्विक मानकों पर खरी उतरती हैं, तो जापान इस संभावित नुकसान की भरपाई कर सकता है. जापान इस बात को भी अच्छी तरह समझता है कि उसके द्वारा पश्चाताप प्रकट करने के बाद भी दक्षिण एशियाई देशों में उसके प्रति दमित आक्रोष है अौर अासियान वाली बिरादरी में सक्रियता बहुत लाभप्रद होनेवाली नहीं है.
कुल मिला कर, इस वक्त भारत अौर जापान के राष्ट्रीय हितों में अभूतपूर्व संयोग-सन्निपात दिखलाई दे रहा है. जापान आज इस बारे में आश्वस्त नहीं कि संकट की घड़ी में अमेरिकी संरक्षक छत्रछाया उसे उपलब्ध होगी या चीन के साथ मुठभेड़ में उस महाशक्ति का समर्थन उसे मिलेगा. पुतिन के रूस के साथ अमेरिका तथा चीन के बदलते रिश्तों का प्रभाव भारत अौर जापान पर बदले बिना नहीं रह सकता.
पुष्पेश पंत
वरिष्ठ स्तंभकार
भारत का एक विश्वसनीय मित्र
