सरकार द्वारा काला धन रोकने की दिशा में बड़े मूल्य वाले नोटों के विमुद्रीकरण को सकारात्मक कदम माना जाना चाहिए़ लेकिन यह जिस तरह से यह व्यवस्था लागू किया गया है, वह देश की अर्थव्यवस्था, कारोबार और सत्तर फीसदी गरीब जनता के लिए बुरे नतीजे देगा. बीते तीन-चार सालों में देश में सौ, पचास, बीस और दस के नोटों की संख्या में भारी कमी आयी है.
पहले तो सरकार को अपने ढ़ाई साल के कार्यकाल में ऐसे नोटों की संख्या को दस से बीस गुना बढ़ाना चाहिए था. यह मालूम हो कि त्योहारों, लेन-देन और बिक्री-बट्टे के लिए ऐसे नोटों की जरूरत अधिक होती है़ इसके अलावा मजदूरों के लिए छोटे नोटों की अधिक अहमियत होती है. छोटे नोट काला धन जमा करने में काम नहीं आते हैं. बड़े मूल्य वाले दो हजार के नोट जारी करना सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करता है.
डॉ चंद्रभूषण चौधरी , रांची
