युद्ध, बाजार और जनहित

डॉ अनुज लुगुन सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया एडुआर्डो गलियानो ने कहा था कि ‘युद्ध वैसे ही बेचे जाते हैं जैसे कारें, झूठ बोल कर.’ एडुआर्डो गलियानो ने यह बात साम्राज्यवादी शक्तियों की साजिशों के खिलाफ कही थी. ऐसी साम्राज्यवादी शक्तियां, जिनका पूरे मीडिया पर कब्जा है, जो बाजार को अपने हितों के […]

डॉ अनुज लुगुन
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
एडुआर्डो गलियानो ने कहा था कि ‘युद्ध वैसे ही बेचे जाते हैं जैसे कारें, झूठ बोल कर.’ एडुआर्डो गलियानो ने यह बात साम्राज्यवादी शक्तियों की साजिशों के खिलाफ कही थी. ऐसी साम्राज्यवादी शक्तियां, जिनका पूरे मीडिया पर कब्जा है, जो बाजार को अपने हितों के अनुकूल संचालित करती हैं.
युद्ध को भी मीडिया के जरिये ही बाजार में उतारा जाता है- कूटनीति और हथियार- सब कुछ का बाजार गर्म रहता है, गर्म किया जाता है. चूंकि इस संबंध में हथियार विक्रेता का पक्ष सबसे मजबूत होता है, इसलिए युद्ध में उसे ही लाभ मिलता है. युद्ध में शामिल बाकी किसी भी पक्ष को कभी कुछ नहीं मिलता है, सिवाय तबाही के. आवेशित भावनाओं और सत्ता पक्ष के विचारों की तुष्टि के सिवाय युद्ध कभी भी आम जन के लिए हितकारी नहीं रहा है.
कवयित्री महादेवी वर्मा ने युद्ध को नारी के पक्ष से देखते हुए कहा था कि युद्ध के बारे में उन सैनिकों की स्त्रियों से पूछा जाना चाहिए, जो सैनिक युद्ध-भूमि में कुर्बान हो जाते हैं. दो महायुद्धों के बाद यूरोप में फैली हताशा से पैदा हुई अस्तित्ववादी चिंतन, उससे प्रभावित कला, साहित्य और सिनेमा भी इसकी भयावहता का परिचय देती है.
कहा जाता है कि हर वर्दी के पीछे एक किसान होता है, लेकिन युद्ध से कभी किसान या मजदूर को कोई हित नहीं हुआ है. हां, युद्ध की भावनाओं को भड़का कर सत्ताएं जरूर बदल जाती हैं.
आज विश्व के मानचित्र पर कई पुराने झगड़ों का निपटारा नहीं हुआ है. इसके साथ ही और कई नये तनाव-क्षेत्र पैदा हो रहे हैं. देखा जाये तो हर जगह छोटे-छोटे टुकड़ों में युद्ध जारी है.
इजरायल और फिलीस्तीन का मुद्दा तो मनुष्यता के लिए नासूर बन गया है. आज पाकिस्तान के साथ हमारे देश का तनाव भी फिर से उभर कर सामने आया है. इस तनाव को जन-भावनाओं में रूपांतरित करने की कोशिश भी हो रही है. न्यूज चैनलों की बहसों में ऐसा लगता है कि जैसे अभी न्यूज एंकर खुद ही मिसाइल दाग देंगे. जो गुस्सा और आवेग एंकर और अन्य प्रतिभागी दिखाते हैं, वह जन के मन में सवाल पैदा करता है.
क्या मीडिया युद्ध को बेच रहा है? या, किसी पक्ष के राजनीतिक हित के लिए माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है? इस पूरे प्रकरण में आम जन कहां है? क्या देश की सुरक्षा भावनाओं के अतिरेक से होती है, या मजबूत तर्क और बेहतर सामाजिक रणनीति से?अकसर हम भारतीय इस बात पर गर्व करते हैं कि हमारे पूर्वजों ने दुनिया को ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का संदेश दिया है.
यानी सारी धरती ही हमारा परिवार है. यह युद्ध-विरोधी विचार है, लेकिन पाकिस्तान की बात आते ही हमारी भावनाएं उबल पड़ती हैं. क्या हमने यह मान लिया है कि दुश्मन को नेस्तनाबूद करके ही जनहित की बात की जा सकती है? या, जनहित के मुद्दों-मसलों को नजरअंदाज करने के लिए ही एक दुश्मन का चेहरा आम जनता के सामने लाया जाता है और उसकी भावनाओं को ‘हाइजैक’ कर लिया जाता है? हाल के दिनों में हमारे देश में कुछ ऐसी घटनाएं घटी हैं, जिनसे सत्ता के जनपक्षीय मुखौटे का सत्य देखने को मिला है.
गुजरात के ऊना में दलितों के उत्पीड़न की घटना, ओड़िशा में दाना मांझी द्वारा अपनी पत्नी की लाश को कंधों पर ढोना और झारखंड के बड़कागांव में विस्थापन का विरोध कर रहे किसानों पर गोलीकांड की घटना. ये कुछ ऐसी घटनाएं हैं, जो हमारी व्यवस्थागत संरचना के दरारों को दिखाती हैं. लेकिन, इन मुद्दों पर बहस ज्यादा समय तक नहीं टिकती है. इन सबसे यह पता चलता है कि आजादी के बाद से अब तक हमारी सरकारों ने बुनियादी सवालों को हल करने की दिशा में ठोस पहलकदमी नहीं की है. किसानों, मजदूरों, दलितों, स्त्रियों और आदिवासियों के सवाल पर शायद ही जन-भावनाएं उबलती हैं, और शायद ही वंचितों के पक्ष में खड़े होने की तत्परता दिखाई देती है.
यहां जो जितना लिजलिजा है, वह उतना ही उद्घाटित होता है और जो जितना प्रखर और तीखा है, वह उतना ही उपेक्षित कर दिया जाता है. किसी भी समाज में सत्ता का यह स्वाभाविक चरित्र होता है. हमेशा दुश्मन का अमूर्त और आभासी रूप दिखा-दिखा कर सत्ता तंत्र खुद को सुरक्षित करता रहता है. संभवतः इसी बात से वाकिफ होकर भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपने नाटक ‘भारत दुर्दशा’ में भारत की दुर्दशा के लिए आंतरिक कारकों को ही चिह्नित करने का प्रयास किया था, जो बाह्य ताकतों से सहज ही अपना गंठबंधन बना लेते हैं.
सामाजिक न्याय और विश्वास ही देश को सुरक्षित बनाता है. इसकी जिम्मेवारी हमारी सरकारों की है. लेकिन, आमतौर पर बुनियादी सवालों का जवाब देने के बजाय इन सवालों को ही परिदृश्य से गायब कर देने की साजिश होती है. हमारे देश की संसदीय पार्टियां बुनियादी सवालों को नोटिस करने के बजाय भावनाओं को ‘हाइजैक’ करने में दक्ष हैं, और हरेक पांच साल में यह दिखाई भी देता है. यही वजह है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने के बावजूद हमारे देश में कश्मीर, पूर्वोत्तर और नक्सल जैसे मुद्दे सुलझने के बजाय और उलझ रहे हैं.
दुनिया भर में युद्ध का जहां भी बाजार है, वहां एक ओर तो विकास और सुरक्षा की बातें हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर मानवाधिकारों और जनहितों का भयानक दमन है. देश की सुरक्षा का सवाल हम सबका अनिवार्य पक्ष है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर जनहितों की उपेक्षा की जो साजिश होती है, उस पर तार्किक नजर रखने की जरूरत भी है. मानव विकास सूचकांक में निचले पायदान पर खड़े देश के नागरिकों को तो इस पर सतर्क होकर विचार करना चाहिए. इस बात को तार्किकता से समझने की जरूरत है कि युद्धक हथियारों के जो निर्यातक हैं, दरअसल वही युद्ध के भी निर्यातक हैं.
उनके लिए लाभ की स्थिति तभी बनी रह सकती है, जब दो देशों या दो पक्षों के बीच युद्ध की आशंका वाला तनाव बना रहे. निस्संदेह हथियारों के ये निर्यातक भारत और पाकिस्तान को भी एक बाजार की तरह ही देखते हैं. ऐसे में हमारी जिम्मेवारी है कि हम अपने देश की सुरक्षा को लेकर जरूर चिंतित हों, लेकिन यह भी ध्यान रखें कि हम युद्ध के बाजार में उलझ न जायें. ऐसा करके ही हम अपने देश में आधारभूत विकास और जनहित को संभव कर पायेंगे.

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