‘बैड लोन’ का ग्रहण

भारतीय अर्थव्यवस्था अपने विशाल आकार और सबसे तेज बढ़वार के बूते विकसित देशों को यह संदेश दे रही है कि 21वीं सदी में वैश्विक आर्थिक विकास की धुरी एशिया के देशों, विशेषकर भारत और चीन, में ही केंद्रित रहनेवाली है. लेकिन, देश की बैंकिंग व्यवस्था को ‘बैड लोन’ के महारोग से जल्दी छुटकारा नहीं मिला, […]

भारतीय अर्थव्यवस्था अपने विशाल आकार और सबसे तेज बढ़वार के बूते विकसित देशों को यह संदेश दे रही है कि 21वीं सदी में वैश्विक आर्थिक विकास की धुरी एशिया के देशों, विशेषकर भारत और चीन, में ही केंद्रित रहनेवाली है. लेकिन, देश की बैंकिंग व्यवस्था को ‘बैड लोन’ के महारोग से जल्दी छुटकारा नहीं मिला, तो आर्थिक महाशक्ति बनने के हमारे इस आशावाद को तेज झटका लग सकता है. रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश के बैंकों की गैर-निष्पादक परिसंपत्ति (एनपीए) दिसंबर, 2015 के 121 अरब डॉलर से बढ़ कर जून, 2016 में 138 अरब डॉलर हो चुकी है. एनपीए बैंकों द्वारा दिये गये उस कर्ज को कहा जाता है, जिसके डूबने की आशंका हो और जो निर्धारित अवधि में तय ब्याज जुटा पाने में असफल रहा हो. छह माह में एनपीए में 15 फीसदी वृद्धि कई कारणों से चिंताजनक है.
बैड लोन की समस्या पहले ज्यादातर छोटे और मंझोले उद्योगों से संबंधित थी. बैंकों से मिला कर्ज सूद समेत नहीं लौटा पानेवालों में ज्यादातर 100 करोड़ से 1,000 करोड़ की मिल्कियत वाले उद्योग-व्यवसाय शामिल थे. लेकिन, बैड लोन में वृद्धि का नया चक्र संकेत करता है कि अब 5,000 करोड़ या उससे ज्यादा के उद्यम यानी बड़े कॉरपोरेट भी कर्ज की रकम नहीं लौटा रहे हैं.
हालत यह है कि कुछ कर्जदार कॉरपोरेट के पास मौजूद कुल संपदा का बाजार-मूल्य आज उतना भी नहीं है, जितना कि उनके द्वारा हासिल कर्ज का मूल्य. हालिया रिपोर्टों के मुताबिक इस समय औद्योगिक उत्पादन का संकेतक (इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन या आइआइपी) भी बीते दो महीने से गिरावट का रुझान दिखा रहा है. अगस्त में आइआइपी 0.7 प्रतिशत घटा, तो जुलाई में 2.5 प्रतिशत. मौजूदा वित्त वर्ष के पांच माह यानी अप्रैल से अगस्त के बीच आइआइपी में 0.3 प्रतिशत की गिरावट आयी है. उधर, देश में बेरोजगारी की दर पिछले पांच सालों में सबसे ज्यादा है.
इस तरह बढ़ता बैड लोन, घटता औद्योगिक उत्पादन और रोजगार में कमी एक संकेत है कि देश में निजी पूंजी के लिए निवेश का सकारात्मक वातावरण नहीं बन पाया है और तेज आर्थिक वृद्धि का मौजूदा परिदृश्य मुख्यत: सरकारी निवेश और खर्च के बूते ही दिख रहा है. आरबीआइ के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की सतर्कता से बैंकों के बैड लोन की समस्या चर्चा का विषय बनी है और अच्छी बात है कि सरकार इसके समाधान के प्रयास भी कर रही है. उम्मीद की जानी चाहिए कि बैंकों को बैड लोन की बाधा से मुक्ति दिलाने की राह शीघ्र तलाशी जायेगी, ताकि अर्थव्यवस्था की बढ़वार को कायम रखा जा सके.

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