देश के कई इलाकों में कम बारिश के चलते आसन्न सूखे से निबटने के प्रति केंद्र और राज्य सरकारों के ढीले रवैये पर नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सही ही कहा है कि सरकार को पिछले साल की गलतियों से सबक लेना चाहिए. सरकारों को समय रहते सूखे के संकट से निबटने के उपायों की हिदायत देते हुए कोर्ट ने कहा कि ‘जब घर में आग लगी हो, तब कुआं खोदने का कोई औचित्य नहीं है.’ ‘स्वराज अभियान’ की याचिका में कोर्ट को बताया गया कि मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक इस साल भी देश के करीब 149 जिलों में कम बारिश हुई है.
इनमें उत्तर प्रदेश के 32, गुजरात के 13, बिहार के 12 और पंजाब के 11 जिले शामिल हैं. हालांकि, इस पर केंद्र सरकार की ओर से अदालत को भरोसा दिया गया कि सरकार हालात से निपटने के लिए जरूरी कदम उठा रही है. उल्लेखनीय है कि बीते दो वर्षों के दौरान देश के बड़े हिस्से में औसत से काफी कम बारिश के चलते भीषण सूखे की स्थिति पैदा हुई थी और एक-तिहाई से अधिक आबादी को इस संकट से जूझना पड़ा था. पिछली गर्मियों में भी सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद ही केंद्र और संबंधित राज्य सरकारें हरकत में आयी थीं, जिसके बाद पीड़ितों को कुछ राहत मिल सकी थी.
हालांकि, इस वर्ष मॉनसून अपेक्षाकृत बेहतर रहा है, इसलिए पिछले दो सालों की तरह के भीषण सूखे के आसार नहीं हैं. फिर भी जिन इलाकों में कम बारिश हुई है, वहां मुश्किलें बढ़ सकती हैं. तापमान में वृद्धि और पिछले सूखे के कहर के असर भी हालत बिगाड़ सकते हैं. चिंता की बात यह भी है कि 11 मई के अदालती आदेश के बावजूद सूखा-प्रभावित क्षेत्रों में राहत उपलब्ध कराने की दिशा में प्रगति निराशाजनक रही है. पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा है कि वह अवमानना याचिका दाखिल कर बताये कि कौन-कौन से निर्देशों का पालन नहीं हो रहा है और इसके लिए कौन अधिकारी जिम्मेवार हैं.
किसी भी आपदा से त्रस्त नागरिकों को राहत देना सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेवारी होनी चाहिए, लेकिन इस मामले में अदालत के फैसले और संसद द्वारा पारित कानून की अनदेखी हुई है. उम्मीद है कि देर से ही सही, पर अदालत की कड़ी फटकार के बाद केंद्र और राज्य सरकारें सूखे से निबटने और प्रभावितों को राहत मुहैया कराने के लिए त्वरित प्रयास करेंगी.
