पुष्परंजन
ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक
एक बिल ने बवाल खड़ा कर दिया है, जिसे अमेरिकी कांग्रेस ने राष्ट्रपति ओबामा के वीटो के बावजूद पास किया है. बीते 28 सितंबर को ‘जस्टिस अगेंस्ट स्पाॅन्सर ऑफ टेररिज्म’ (जस्टा) के पारित होने के बाद अमेरिकी नागरिकों को यह अधिकार मिल गया है कि यदि अमेरिकी सरजमी पर आतंकी घटना होती है और उसमें कोई अमेरिकी नागरिक मारा जाता है, तो संबंधित देश के विरुद्ध अदालत में वे मुकदमा कर सकते हैं. आतंकियों को सिर्फ पैसे से ही नहीं, उन्हें उकसाने या किसी भी रूप में समर्थन देना ‘जस्टा’ के दायरे में आयेगा. व्हाॅइट हाउस इस कानून के बनने के खिलाफ इसलिए था, क्योंकि कुछ इसी तरह का कांड दूसरे देश में होता है और उसकी वजह अमेरिकी अधिकारी बनते हैं. ऐसे में यह संभव है कि उस देश के नागरिक अमेरिका के विरुद्ध अदालत में जायें.
‘जस्टा’ को लेकर सऊदी अरब सबसे अधिक नाराज है. कारण, 9/11 के हमलावर हैं. अमेरिका ने चार्ज फ्रेम किया है कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को ध्वस्त करने के वास्ते जिन 19 लोगों ने विमानों का अपचालन किया था, उनमें से 15 सऊदी अरब के नागरिक थे. गल्फ बादशाहत ने इस आरोप को गलत कहा है कि 9/11 के आतंकियों को तैयार करने में उसका कोई हाथ था.
सऊदी विदेश मंत्रालय ने ‘9/11 कमीशन’ की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उसमें कहीं से यह साबित नहीं हुआ कि रियाद का कोई हाथ है, या फिर किसी सऊदी अधिकारी की वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले में शिरकत थी. सऊदी विदेश मंत्रालय का यह भी मानना है कि ‘जस्टा’ के जरिये किसी देश की संप्रभुता और उन्मुक्ति के अधिकार का हनन होता है. रूस ने ‘जस्टा’ की कटु आलोचना करते हुए कहा है कि इससे अंतरराष्ट्रीय कानून का अवमूल्यन होता है.
व्हाइट हाउस ने पहले जो आशंका व्यक्त की थी, वैसा ही कुछ इराक में हुआ है. ‘अरब प्रोजेक्ट इन इराक’ एक लॉबी है, जो 2003 में सद्दाम हुसैन को सत्ता से बाहर करने और लाखों इराकियों का खून बहाने के वास्ते अमेरिका को जिम्मेवार मानती है. बीते शनिवार को ‘अल अरबिया’ ने खबर दी कि यह लॉबी ‘जस्टा’ जैसा ही एक कानून इराकी संसद में पास करा कर, उसी आधार पर अमेरिका को कटघरे में खड़ा करना चाहती है.
अभी तो यह शुरुआत भर है. आगे, अमेरिका के कई सारे पश्चिमी मित्र और नाटो में सबसे अधिक सक्रिय तुर्की को लपेटने के प्रयास होंगे. मामला सिर्फ इराक तक नहीं रुकेगा. अफगानिस्तान से लेकर वियतनाम तक, अमेरिका और उसके मित्र देशों की ‘जिम्मेवारी’ तय की जा सकती है. ‘जस्टा’ के जरिये, ऐसे बर्रे के छत्ते में हाथ डालने की मुहिम शुरू हो गयी है, जिससे बहस के एक नये सिलसिले की शुरुआत होगी. बहस इस पर भी होगी कि आखिर युद्ध अपराध की सुनवाई के लिए बने ‘अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय’ की भूमिका क्या रह जाती है?
अब ‘जस्टा’ को दूसरे नुक्त-ए-नजर से देखने की जरूरत है. यह वजह जानना चाहिए कि अमेरिका, सिर्फ सऊदी अरब को ‘टारगेट’ क्यों करना चाहता है. प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान सऊदी अरब के गृह मंत्री हैं और शासन के सबसे ताकतवर शख्सियत माने जाते हैं. सितंबर के शुरू में सऊदी अखबार ‘अल वतन’ में छपे एक लेख में प्रिंस सलमान ने अमेरिका की आलोचना की थी. एशियन मेरीटाइम सिक्योरिटी इनिशिएटिव (एएमएसआइ) ने साउथ चाइना सी मामले में चीन को समर्थन देनेवाले जिन 31 देशों की सूची जारी की थी, उनमें सऊदी अरब भी है.
तुर्की भी धीरे-धीरे अमेरिकी प्रभामंडल से बाहर निकल रहा है. तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोआन इस बात से नाराज हैं कि अमेरिका ने फतेउल्लाह गुलेन को अंकारा के हवाले नहीं किया.
पेंसिल्वेनिया के सेलोसबुर्ग में रह रहे गुलेन को तुर्की में सत्ता पलट के प्रयासों का मास्टरमाइंड घोषित कर दिया गया है. दूसरी ओर, अमेरिका गुलेन के प्रत्यर्पण पर चुप है. इससे पता चलता है कि खाड़ी देशों में भू-सामरिक स्थितियां बदल रही हैं और उसमें सऊदी अरब लीड ले रहा है.
मगर, ‘जस्टा’ के दायरे में पाकिस्तान क्यों नहीं आ रहा है? यह सवाल तो बनता है. एबटाबाद में बिन लादेन का वध, बलूचिस्तान में मुल्ला मंसूर का अमेरिकी ड्रोन से मारा जाना, अयमान अल जवाहिरी का पाकिस्तान में छिपे रहना, अफगान-पाक सीमा पर नाटो विरोधी आतंकी कैंप, क्या इतना कुछ काफी नहीं है कि अमेरिका में पाकिस्तान के विरुद्ध मुकदमा चलाया जाये? यदि अमेरिका उसे देख कर भी अनदेखी कर रहा है, तो भारत को चाहिए कि वह अपने कूटनीतिक चैनल को इस वास्ते सक्रिय करे.
‘जस्टा’ जैसा कानून भारत को दिशा देता है कि हमें भी पाकिस्तान को दबोचने के लिए ऐसा कुछ करना चाहिए. भारत को चाहिए कि संसद का विशेष सत्र बुला कर अमेरिका की तरह ‘जस्टा’ जैसा ही विधेयक पास कराये और उसे कानून का रूप दे. ऐसा खेल पाकिस्तान भी कर सकता है. इसके लिए किंतु-परंतु का समय नहीं है!
